Love Poetry (page 33)
ऐ मौसम-ए-जुनूँ ये अजब तर्ज़-ए-क़त्ल है
इबरत मछलीशहरी
सुकूँ-परवर है जज़्बाती नहीं है
इबरत बहराईची
ख़याल-ए-बद से हमा-वक़्त इज्तिनाब करो
इबरत बहराईची
चाहे सहरा में चाहे घर रहना
इबरत बहराईची
ज़िंदगी वादी ओ सहरा का सफ़र है क्यूँ है
इब्राहीम अश्क
ज़िंदगी अपनी मुसलसल चाहतों का इक सफ़र
इब्राहीम अश्क
ये और बात है कि बरहना थी ज़िंदगी
इब्राहीम अश्क
थी हौसले की बात ज़माने में ज़िंदगी
इब्राहीम अश्क
बिखरे हुए थे लोग ख़ुद अपने वजूद में
इब्राहीम अश्क
ज़िंदगी वादी ओ सहरा का सफ़र है क्यूँ है
इब्राहीम अश्क
उस की इक दुनिया हूँ मैं और मेरी इक दुनिया है वो
इब्राहीम अश्क
तिरी ज़मीं से उठेंगे तो आसमाँ होंगे
इब्राहीम अश्क
शीशे का आदमी हूँ मिरी ज़िंदगी है क्या
इब्राहीम अश्क
रू-ब-रू उन के कोई हर्फ़ अदा क्या करते
इब्राहीम अश्क
रात भर तन्हा रहा दिन भर अकेला मैं ही था
इब्राहीम अश्क
न कू-ए-यार में ठहरा न अंजुमन में रहा
इब्राहीम अश्क
मोहब्बतों में जो मिट मिट के शाहकार हुआ
इब्राहीम अश्क
मिशअल-ब-कफ़ कभी तो कभी दिल-ब-दस्त था
इब्राहीम अश्क
मैं कब रहीन-ए-रेग-ए-बयाबान-ए-यास था
इब्राहीम अश्क
लबों पर प्यास हो तो आस के बादल भरे रखियो
इब्राहीम अश्क
गुलशन में ले के चल किसी सहरा में ले के चल
इब्राहीम अश्क
ग़ज़ल हो गई जब भी सोचा तुम्हें
इब्राहीम अश्क
दुनिया लुटी तो दूर से तकता ही रह गया
इब्राहीम अश्क
अना ने टूट के कुछ फ़ैसला किया ही नहीं
इब्राहीम अश्क
मिरी नज़र में है अंजाम इस तआक़ुब का
इब्राहीम होश
मैं वो नहीं कि ज़माने से बे-अमल जाऊँ
इब्राहीम होश
दैर-ओ-हरम में दश्त-ओ-बयाबान-ओ-बाग़ में
इब्राहीम होश
हुस्न बना जब बहती गंगा
इब्न-ए-सफ़ी
चाँद का हुस्न भी ज़मीन से है
इब्न-ए-सफ़ी
बिल-आख़िर थक हार के यारो हम ने भी तस्लीम किया
इब्न-ए-सफ़ी