Love Poetry (page 31)
खज़ाना-ए-ज़र-ओ-गौहर पे ख़ाक डाल के रख
इफ़्तिख़ार आरिफ़
कहीं से कोई हर्फ़-ए-मो'तबर शायद न आए
इफ़्तिख़ार आरिफ़
कहाँ के नाम ओ नसब इल्म क्या फ़ज़ीलत क्या
इफ़्तिख़ार आरिफ़
जुनूँ का रंग भी हो शोला-ए-नुमू का भी हो
इफ़्तिख़ार आरिफ़
इन्हीं में जीते इन्हीं बस्तियों में मर रहते
इफ़्तिख़ार आरिफ़
हम अपने रफ़्तगाँ को याद रखना चाहते हैं
इफ़्तिख़ार आरिफ़
हम अहल-ए-जब्र के नाम-ओ-नसब से वाक़िफ़ हैं
इफ़्तिख़ार आरिफ़
हामी भी न थे मुंकिर-ए-'ग़ालिब' भी नहीं थे
इफ़्तिख़ार आरिफ़
फ़ज़ा में वहशत-ए-संग-ओ-सिनाँ के होते हुए
इफ़्तिख़ार आरिफ़
दोस्त क्या ख़ुद को भी पुर्सिश की इजाज़त नहीं दी
इफ़्तिख़ार आरिफ़
अज़ाब ये भी किसी और पर नहीं आया
इफ़्तिख़ार आरिफ़
अहल-ए-मोहब्बत की मजबूरी बढ़ती जाती है
इफ़्तिख़ार आरिफ़
अब भी तौहीन-ए-इताअत नहीं होगी हम से
इफ़्तिख़ार आरिफ़
सुन सुन के चुप हैं ताना-ए-अग़्यार क्या करें
इफ़तिख़ार अहमद फख्र
क़ुर्बान जाऊँ हुस्न-ए-क़मर इंतिसाब के
इफ़तिख़ार अहमद फख्र
हुस्न यूँ इश्क़ से नाराज़ है अब
इफ़्तिख़ार आज़मी
तसव्वुर
इफ़्तिख़ार आज़मी
शौक़
इफ़्तिख़ार आज़मी
नाकामी
इफ़्तिख़ार आज़मी
हासिल
इफ़्तिख़ार आज़मी
आप-बीती
इफ़्तिख़ार आज़मी
शोर-ए-दरिया-ए-वफ़ा इशरत-ए-साहिल के क़रीब
इफ़्तिख़ार आज़मी
रह-ए-वफ़ा से मैं इक गाम भी हटा तो नहीं
इफ़्तिख़ार आज़मी
दर्द अब दिल की दवा हो जैसे
इफ़्तिख़ार आज़मी
अगर वो चाँद की बस्ती का रहने वाला था
इफ़्फ़त ज़र्रीं
ज़ेहन ओ दिल के फ़ासले थे हम जिन्हें सहते रहे
इफ़्फ़त ज़र्रीं
रूह जिस्मों से बाहर भटकती रही
इफ़्फ़त ज़र्रीं
ख़्वाब आँखों से ज़बाँ से हर कहानी ले गया
इफ़्फ़त ज़र्रीं
जिस्म-ओ-जाँ की बस्ती में सिलसिले नहीं मिलते
इफ़्फ़त ज़र्रीं
बे-सम्त रास्तों पे सदा ले गई मुझे
इफ़्फ़त ज़र्रीं