Love Poetry (page 30)
बारहवाँ खिलाड़ी
इफ़्तिख़ार आरिफ़
बन-बास
इफ़्तिख़ार आरिफ़
बद-शुगूनी
इफ़्तिख़ार आरिफ़
बदन-दरीदा रूहों के नाम एक नज़्म
इफ़्तिख़ार आरिफ़
अबू-तालिब के बेटे
इफ़्तिख़ार आरिफ़
ज़रा सी देर को आए थे ख़्वाब आँखों में
इफ़्तिख़ार आरिफ़
ये क़र्ज़-ए-कज-कुलही कब तलक अदा होगा
इफ़्तिख़ार आरिफ़
ये नक़्श हम जो सर-ए-लौह-ए-जाँ बनाते हैं
इफ़्तिख़ार आरिफ़
ये बस्तियाँ हैं कि मक़्तल दुआ किए जाएँ
इफ़्तिख़ार आरिफ़
ये बस्ती जानी-पहचानी बहुत है
इफ़्तिख़ार आरिफ़
ये अब खुला कि कोई भी मंज़र मिरा न था
इफ़्तिख़ार आरिफ़
वफ़ा की ख़ैर मनाता हूँ बेवफ़ाई में भी
इफ़्तिख़ार आरिफ़
थकन तो अगले सफ़र के लिए बहाना था
इफ़्तिख़ार आरिफ़
तार-ए-शबनम की तरह सूरत-ए-ख़स टूटती है
इफ़्तिख़ार आरिफ़
सुख़न-ए-हक़ को फ़ज़ीलत नहीं मिलने वाली
इफ़्तिख़ार आरिफ़
सितारा-वार जले फिर बुझा दिए गए हम
इफ़्तिख़ार आरिफ़
शिकस्ता-पर जुनूँ को आज़माएँगे नहीं क्या
इफ़्तिख़ार आरिफ़
शहर-ए-गुल के ख़स-ओ-ख़ाशाक से ख़ौफ़ आता है
इफ़्तिख़ार आरिफ़
सर-ए-बाम-ए-हिज्र दिया बुझा तो ख़बर हुई
इफ़्तिख़ार आरिफ़
समुंदर इस क़दर शोरीदा-सर क्यूँ लग रहा है
इफ़्तिख़ार आरिफ़
समझ रहे हैं मगर बोलने का यारा नहीं
इफ़्तिख़ार आरिफ़
सब चेहरों पर एक ही रंग और सब आँखों में एक ही ख़्वाब
इफ़्तिख़ार आरिफ़
मिरे ख़ुदा मुझे इतना तो मो'तबर कर दे
इफ़्तिख़ार आरिफ़
मेरा मालिक जब तौफ़ीक़ अर्ज़ानी करता है
इफ़्तिख़ार आरिफ़
कोई तो फूल खिलाए दुआ के लहजे में
इफ़्तिख़ार आरिफ़
कोई मुज़्दा न बशारत न दुआ चाहती है
इफ़्तिख़ार आरिफ़
कोई जुनूँ कोई सौदा न सर में रक्खा जाए
इफ़्तिख़ार आरिफ़
ख़्वाब-ए-देरीना से रुख़्सत का सबब पूछते हैं
इफ़्तिख़ार आरिफ़
ख़्वाब की तरह बिखर जाने को जी चाहता है
इफ़्तिख़ार आरिफ़
ख़्वाब देखने वाली आँखें पत्थर होंगी तब सोचेंगे
इफ़्तिख़ार आरिफ़