Love Poetry (page 37)
हर्कुलेस और पाटे-ख़ान की सर्कस
हुसैन आबिद
राहत ओ रंज से जुदा हो कर
हुसैन आबिद
ख़यालों ख़यालों में किस पार उतरे
हुसैन आबिद
ज़ौक़-ए-तकल्लुम पर उर्दू ने राह अनोखी खोली है
हुरमतुल इकराम
यगानगी में भी दुख ग़ैरियत के सहता हूँ
हुरमतुल इकराम
वो दिल समो ले जो दामन में काएनात का कर्ब
हुरमतुल इकराम
वो दिल जो था किसी के ग़म का महरम हो गया रुस्वा
हुरमतुल इकराम
वो आलम है कि हर मौज-ए-नफ़स है रूह पर भारी
हुरमतुल इकराम
वक़्त गर्दिश में ब-अंदाज़-ए-दिगर है कि जो था
हुरमतुल इकराम
उस के सिवा क्या अपनी दौलत
हुरमतुल इकराम
तय किया इस तरह सफ़र तन्हा
हुरमतुल इकराम
सूरत-ए-सब्ज़ा-ए-बे-गाना चमन से गुज़रे
हुरमतुल इकराम
रह-ए-तलब में बड़ी तुर्फ़गी के साथ चले
हुरमतुल इकराम
रहेगा अक़्ल के सीने पे ता-अबद ये दाग़
हुरमतुल इकराम
ख़्वाबों के साथ ज़ेहन की अंगड़ाइयाँ भी हैं
हुरमतुल इकराम
जैसे जैसे दर्द का पिंदार बढ़ता जाए है
हुरमतुल इकराम
फ़रोग़-ए-दीदा-वरी का ज़माना आया है
हुरमतुल इकराम
दिल-ए-आज़ुर्दा को बहलाए हुए हैं हम लोग
हुरमतुल इकराम
दिल को तौफ़ीक़-ए-ज़ियाँ हो तो ग़ज़ल होती है
हुरमतुल इकराम
अपने चमन पे अब्र ये कैसा बरस गया
हुरमतुल इकराम
हम और तुम जो बदल गए तो इतनी हैरत क्या
हुमैरा रहमान
ज़रा सी बात पर नाराज़ होना रंजिशें करना
हुमैरा रहमान
तबीअत इन दिनों औहाम की उन मंज़िलों पर है
हुमैरा रहमान
क़यामतें गुज़र गईं रिवायतों की सोच में
हुमैरा रहमान
लोग तो इक मंज़र हैं तख़्त-नशीनों की ख़ातिर
हुमैरा रहमान
जैसे कोई ज़िद्दी बच्चा कब बहले बहलाने से
हुमैरा रहमान
दिल को दरून-ए-ख़्वाब का मौसम बोझल रखता है
हुमैरा रहमान
वो मुझ को आज़माता ही रहा है ज़िंदगी भर
हुमैरा राहत
वो इश्क़ को किस तरह समझ पाएगा जिस ने
हुमैरा राहत
उसे भी ज़िंदगी करनी पड़ेगी 'मीर' जैसी
हुमैरा राहत