Love Poetry (page 38)

सुना है ख़्वाब मुकम्मल कभी नहीं होते

हुमैरा राहत

न हम से इश्क़ का मफ़्हूम पूछो

हुमैरा राहत

ख़ुशी मेरी गवारा थी न क़िस्मत को न दुनिया को

हुमैरा राहत

वक़्त की आँख से कुछ ख़्वाब नए माँगता है

हुमैरा राहत

तुम्हारे इश्क़ पे दिल को जो मान था न रहा

हुमैरा राहत

तअल्लुक़ की नई इक रस्म अब ईजाद करना है

हुमैरा राहत

मिसाल-ए-ख़ाक कहीं पर बिखर के देखते हैं

हुमैरा राहत

मैं आब-ए-इश्क़ में हल हो गई हूँ

हुमैरा राहत

किसी भी राएगानी से बड़ा है

हुमैरा राहत

कहानी को मुकम्मल जो करे वो बाब उठा लाई

हुमैरा राहत

हवा के साथ ये कैसा मोआमला हुआ है

हुमैरा राहत

फ़साना अब कोई अंजाम पाना चाहता है

हुमैरा राहत

आँखों से किसी ख़्वाब को बाहर नहीं देखा

हुमैरा राहत

वो तक़ाज़ा-ए-जुनूँ अब के बहारों में न था

होश तिर्मिज़ी

तज़ईन-ए-बज़्म-ए-ग़म के लिए कोई शय तो हो

होश तिर्मिज़ी

पास-ए-नामूस-ए-तमन्ना हर इक आज़ार में था

होश तिर्मिज़ी

मिलता नहीं मिज़ाज ख़ुद अपनी अदा में है

होश तिर्मिज़ी

कभी आहें कभी नाले कभी आँसू निकले

होश तिर्मिज़ी

गो दाग़ हो गए हैं वो छाले पड़े हुए

होश तिर्मिज़ी

दिल को ग़म रास है यूँ गुल को सबा हो जैसे

होश तिर्मिज़ी

अजीब हाल था अहद-ए-शबाब में दिल का

हीरानंद सोज़

कोई मोनिस नहीं मेरा कोई ग़म-ख़्वार नहीं

हीरानंद सोज़

उन के सब झूट मो'तबर ठहरे

हिना हैदर

ज़िंदगी की बात सुन कर क्या कहें

हिमायत अली शाएर

सिर्फ़ ज़िंदा रहने को ज़िंदगी नहीं कहते

हिमायत अली शाएर

मैं कुछ न कहूँ और ये चाहूँ कि मिरी बात

हिमायत अली शाएर

हर तरफ़ इक मुहीब सन्नाटा

हिमायत अली शाएर

बदन पे पैरहन-ए-ख़ाक के सिवा क्या है

हिमायत अली शाएर

तज़ाद

हिमायत अली शाएर

मुद्दत के बाद

हिमायत अली शाएर