Love Poetry (page 358)

अजब जुनून-ए-मसाफ़त में घर से निकला था

अहमद फ़राज़

ऐसे चुप हैं कि ये मंज़िल भी कड़ी हो जैसे

अहमद फ़राज़

ऐसा है कि सब ख़्वाब मुसलसल नहीं होते

अहमद फ़राज़

अगरचे ज़ोर हवाओं ने डाल रक्खा है

अहमद फ़राज़

अब क्या सोचें क्या हालात थे किस कारन ये ज़हर पिया है

अहमद फ़राज़

अब के तजदीद-ए-वफ़ा का नहीं इम्काँ जानाँ

अहमद फ़राज़

अब के हम बिछड़े तो शायद कभी ख़्वाबों में मिलें

अहमद फ़राज़

अब और क्या किसी से मरासिम बढ़ाएँ हम

अहमद फ़राज़

आशिक़ी में 'मीर' जैसे ख़्वाब मत देखा करो

अहमद फ़राज़

आँख से दूर न हो दिल से उतर जाएगा

अहमद फ़राज़

आज मुझे अपनी आँखों से उस के क़ुर्ब की ख़ुशबू आई

अहमद फ़क़ीह

वक़्त के हर इक नक़्श का मअ'नी इतना बदला बदला होगा

अहमद फ़क़ीह

सदियों के अँधेरे में उतारा करे कोई

अहमद फ़क़ीह

मैं क्या हूँ मुझे तुम ने जो आज़ार पे खींचा

अहमद फ़क़ीह

चारागरों ने बाँध दिया मुझ को बख़्त से

अहमद फ़क़ीह

उस पार तो ख़ैर आसमाँ है

अहमद अज़ीमाबादी

क्या ढूँडने निकली है किसी क़ैस को पागल

अहमद अज़ीम

मैं तो सोया भी न था क्यूँ ये दर-ए-ख़्वाब गिरा

अहमद अज़ीम

किसे ख़बर कि है क्या क्या ये जान थामे हुए

अहमद अज़ीम

इसी लिए तो हार का हुआ नहीं मलाल तक

अहमद अज़ीम

इश्क़ में हो के मुब्तिला दिल ने कमाल कर दिया

अहमद अज़ीम

फ़ित्ना उठा तो रज़्म-गह-ए-ख़ाक से उठा

अहमद अज़ीम

दस्तक हवा की सुन के कभी डर नहीं गया

अहमद अज़ीम

ऐसी भी कहाँ बे-सर-ओ-सामानी हुई है

अहमद अज़ीम

ऐसा इलाज-ए-हब्स-ए-दिल-ए-ज़ार चाहिए

अहमद अज़ीम

वही दरिंदा

अहमद आज़ाद

उस लम्हे के लिए मुझे फ़ुर्सत नहीं

अहमद आज़ाद

तुम कहाँ हो

अहमद आज़ाद

नज़्म

अहमद आज़ाद

ज़िंदगी ख़्वाब है और ख़्वाब भी ऐसा कि मियाँ

अहमद अता