Love Poetry (page 51)
लोग कहते हैं कि सूरज में अँधेरा क्यूँ है
हसीर नूरी
ज़रा सी चोट लगी थी कि चलना भूल गए
हसीब सोज़
यहाँ मज़बूत से मज़बूत लोहा टूट जाता है
हसीब सोज़
शौक़ से आप ये अंग्रेज़ी दवा भी लेते
हसीब सोज़
नज़र न आए हम अहल-ए-नज़र के होते हुए
हसीब सोज़
खुला ये राज़ कि ये ज़िंदगी भी होती है
हसीब सोज़
हमारे ख़्वाब सब ताबीर से बाहर निकल आए
हसीब सोज़
अब उसे छोड़ के जाना भी नहीं चाहते हम
हसीब सोज़
किसे हम अपना कहें कोई ग़म-गुसार नहीं
हसीब रहबर
जो बात हक़ीक़त हो बे-ख़ौफ़-ओ-ख़तर कहिए
हसीब रहबर
यहाँ न मैं हूँ न तू है न कोई शहनाई
हसन ताहिर
ग़म-ए-हयात ने फ़ुर्सत न दी सुनाने की
हसन ताहिर
चले गए हो सुकून-ओ-क़रार-ए-जाँ ले कर
हसन ताहिर
ये उस के प्यार की बातें फ़क़त क़िस्से पुराने हैं
हसन रिज़वी
न वो इक़रार करता है न वो इंकार करता है
हसन रिज़वी
कभी किताबों में फूल रखना कभी दरख़्तों पे नाम लिखना
हसन रिज़वी
उम्र सारी यूँही गुज़ारी है
हसन रिज़वी
ठहरे पानी को वही रेत पुरानी दे दे
हसन रिज़वी
तमाम शोबदे उस के कमाल उस के हैं
हसन रिज़वी
सूरत है वो ऐसी कि भुलाई नहीं जाती
हसन रिज़वी
साँझ-सवेरे फिरते हैं हम जाने किस वीराने में
हसन रिज़वी
फिर नए ख़्वाब बुनें फिर नई रंगत चाहें
हसन रिज़वी
पहले सी अब बात कहाँ है
हसन रिज़वी
न वो इक़रार करता है न वो इंकार करता है
हसन रिज़वी
मोहब्बत का अजब ज़ाविया है
हसन रिज़वी
मैं ने उस को बर्फ़ दिनों में देखा था
हसन रिज़वी
मैं अपने आप से ग़ाफ़िल न यूँ हुआ होता
हसन रिज़वी
कोई मौसम भी हम को रास नहीं
हसन रिज़वी
खिलने लगे हैं फूल और पत्ते हरे हुए
हसन रिज़वी
कभी किताबों में फूल रखना कभी दरख़्तों पे नाम लिखना
हसन रिज़वी