Love Poetry (page 50)
और थोड़ा सा बिखर जाऊँ यही ठानी है
हसनैन आक़िब
तुम्हारे साथ ये झूटे फ़क़ीर रहते हैं
हसनैन आक़िब
किस के दिल में बसता हूँ
हसनैन आक़िब
ख़ाना-ए-दिल कि मोअत्तर भी बहुत लगता है
हसनैन आक़िब
हार कर बाज़ी फिर इक तदबीर हो जाऊँगा मैं
हसनैन आक़िब
दानाइयाँ अटक गईं लफ़्ज़ों के जाल में
हसनैन आक़िब
और थोड़ा सा बिखर जाऊँ यही ठानी है
हसनैन आक़िब
सारी रुस्वाई ज़माने की गवारा कर के
हाशिम रज़ा जलालपुरी
ज़िंदगी क्या यूँही नाशाद करेगी मुझ को
हाशिम रज़ा जलालपुरी
ज़र्द मौसम में भी इक शाख़ हरी रहती है
हाशिम रज़ा जलालपुरी
ज़मीनों में सितारे बो रहा हूँ
हाशिम रज़ा जलालपुरी
ये उस की मर्ज़ी कि मैं उस का इंतिख़ाब न था
हाशिम रज़ा जलालपुरी
वो सब में हम को बार-ए-दिगर देखते रहे
हाशिम रज़ा जलालपुरी
वो मिरे शहर में आता है चला जाता है
हाशिम रज़ा जलालपुरी
विसाल-ओ-हिज्र के जंजाल में पड़ा हुआ हूँ
हाशिम रज़ा जलालपुरी
तुम चुप रहे पयाम-ए-मोहब्बत यही तो है
हाशिम रज़ा जलालपुरी
तिरे ख़याल तिरी आरज़ू से दूर रहे
हाशिम रज़ा जलालपुरी
तमाशा अहल-ए-मोहब्बत ये चार-सू करते
हाशिम रज़ा जलालपुरी
सारी रुस्वाई ज़माने की गवारा कर के
हाशिम रज़ा जलालपुरी
परिंदा क़ैद में कुल आसमान भूल गया
हाशिम रज़ा जलालपुरी
मुस्तक़िल हाथ मिलाते हुए थक जाता हूँ
हाशिम रज़ा जलालपुरी
मज़हब-ए-इश्क़ में शजरा नहीं देखा जाता
हाशिम रज़ा जलालपुरी
हादिसा इश्क़ में दरपेश हुआ चाहता है
हाशिम रज़ा जलालपुरी
फ़ैसला हिज्र का मंज़ूर भी हो सकता है
हाशिम रज़ा जलालपुरी
दिल-मोहल्ला ग़ुलाम हो जाए
हाशिम रज़ा जलालपुरी
दश्त में ख़ाक उड़ाते हैं दुआ करते हैं
हाशिम रज़ा जलालपुरी
बहुत दिन तक कोई चेहरा मुझे अच्छा नहीं लगता
हाशिम रज़ा जलालपुरी
बदन से रूह हम-आग़ोश होने वाली थी
हाशिम रज़ा जलालपुरी
निगाहें झुक गईं आया शबाब आहिस्ता आहिस्ता
हाशिम अली ख़ाँ दिलाज़ाक
वक़्त का सूरज जलन के रूप में जब आ गया
हसीर नूरी