दास्ताँ Poetry (page 6)

कभी सुर्ख़ी से लिखता हूँ कभी काजल से लिखता हूँ

सरदार सलीम

ज़माना बड़े शौक़ से सुन रहा था

साक़िब लखनवी

कहाँ तक जफ़ा हुस्न वालों की सहते

साक़िब लखनवी

असीर-ए-इश्क़-ए-मरज़ हैं तो क्या दवा करते

साक़िब लखनवी

मुझे ख़बर न थी इस घर में कितने कमरे हैं

सलमान अख़्तर

मैं तुझ से लाख बिछड़ कर यहाँ वहाँ जाता

सलमान अख़्तर

इन दर-ओ-दीवार की आँखों से पट्टी खोल कर

सलीम शाहिद

तुझे दुश्मनों की ख़बर न थी मुझे दोस्तों का पता नहीं

सलीम कौसर

कहानी लिखते हुए दास्ताँ सुनाते हुए

सलीम कौसर

मैं ख़याल हूँ किसी और का मुझे सोचता कोई और है

सलीम कौसर

क्या बताएँ फ़स्ल-ए-बे-ख़्वाबी यहाँ बोता है कौन

सलीम कौसर

कहानी लिखते हुए दास्ताँ सुनाते हुए

सलीम कौसर

किसी को क्या बताऊँ कौन हूँ मैं

सलीम अहमद

नया मज़मूँ किताब-ए-ज़ीस्त का हूँ

सलीम अहमद

मेरी ग़ज़ल में एक नया सोज़-ए-जाँ भी है

सलीम अहमद

मता-ए-होश यहाँ सब ने बेच डाली है

सलाहुद्दीन नय्यर

दीवार क़हक़हा

सज्जाद बाक़र रिज़वी

जहाँ में रह के भी हम कब जहाँ में रहते हैं

सज्जाद बाक़र रिज़वी

रहीन-ए-ख़्वाब हूँ और ख़्वाब के मकाँ में हूँ

सज्जाद बलूच

रहीन-ए-ख़्वाब हूँ और ख़्वाब के मकाँ में हूँ

सज्जाद बलूच

कब से महव-ए-सफ़र हो

साजिदा ज़ैदी

नहीं है आशियाँ लेकिन है ख़ाक-ए-आशियाँ बाक़ी

साजिद सिद्दीक़ी लखनवी

इतने दुखी हैं हम को मसर्रत भी ग़म बने

सैफ़ ज़ुल्फ़ी

जो शिकायत-ए-ग़म-ए-ज़िंदगी कभी लब पर अपने न ला सके

साइब आसमी

न तो ज़मीं के लिए है न आसमाँ के लिए

साहिर लुधियानवी

अदू-ए-बद-गुमाँ की दास्ताँ कुछ और कही है

साहिर होशियारपुरी

शब-ए-सुरूर नई दास्ताँ विसाल-ओ-फ़िराक़

सहबा वहीद

हर एक बंदिश-ए-ख़ुद-साख़्ता बयाँ से उठा

सहबा वहीद

अब यही रंज-ए-बे-दिली मुझ को मिटाए या बनाए

सहर अंसारी

ख़ाक में मिलती हैं कैसे बस्तियाँ मालूम हो

सग़ीर मलाल

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