शोक Poetry (page 38)

मुझ से मिलने शब-ए-ग़म और तो कौन आएगा

शकेब जलाली

रात के पिछले पहर

शकेब जलाली

सर-ए-रह अब न यूँ मुझ को पुकारो तुम ही आ जाओ

शकेब जलाली

फिर सुन रहा हूँ गुज़रे ज़माने की चाप को

शकेब जलाली

मुझ से मिलने शब-ए-ग़म और तो कौन आएगा

शकेब जलाली

मौज-ए-ग़म इस लिए शायद नहीं गुज़री सर से

शकेब जलाली

मरीज़-ए-ग़म के सहारो कोई तो बात करो

शकेब जलाली

क्या कहिए कि अब उस की सदा तक नहीं आती

शकेब जलाली

ख़्वाब-ए-गुल-रंग के अंजाम पे रोना आया

शकेब जलाली

जब तक ग़म-ए-जहाँ के हवाले हुए नहीं

शकेब जलाली

इश्क़ के ग़म-गुसार हैं हम लोग

शकेब जलाली

गूँजता है नाला-ए-महताब आधी रात को

शकेब जलाली

ग़म-ए-उल्फ़त मिरे चेहरे से अयाँ क्यूँ न हुआ

शकेब जलाली

ग़म-ए-हयात की लज़्ज़त बदलती रहती है

शकेब जलाली

बद-क़िस्मती को ये भी गवारा न हो सका

शकेब जलाली

साथ ग़ुर्बत में कोई ग़ैर न अपना निकला

शकेब बनारसी

न दिन पहाड़ लगे अब न रात भारी लगे

शकेब बनारसी

दामन-ए-ज़ब्त को अश्कों में भिगो लेता हूँ

शकेब बनारसी

मिरी बयाज़ को शेरों से तुम सजा देना

शाइस्ता यूसुफ़

ये सितारे मुझे दीवार नहीं होने के

शाइस्ता सहर

गुल नहीं ख़ार समझते हैं मुझे

शाइस्ता सहर

बाग़ में कलियों का मुस्काना गया

शाइस्ता सहर

कहें हम बहर-ए-बे-पायान-ए-ग़म की माहियत किस से

शैख़ ज़हूरूद्दीन हातिम

इस दुख में हाए यार यगाने किधर गए

शैख़ ज़हूरूद्दीन हातिम

दिल था बग़ल में मुद्दई ख़ूब हुआ जो ग़म हुआ

शैख़ ज़हूरूद्दीन हातिम

तुर्फ़ा माजून है हमारा यार

शैख़ ज़हूरूद्दीन हातिम

तिरी भुवाँ की तेग़ जब आई नज़र मुझे

शैख़ ज़हूरूद्दीन हातिम

तरीक़त में अगर ज़ाहिद मुझे गुमराह जाने है

शैख़ ज़हूरूद्दीन हातिम

न इतना चाहिए ऐ पुर-शिकम ख़्वाब

शैख़ ज़हूरूद्दीन हातिम

कौन दिल है कि तिरे दर्द में बीमार नहीं

शैख़ ज़हूरूद्दीन हातिम

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