हुआ Poetry (page 142)

आज भी क़ाफ़िला-ए-इश्क़ रवाँ है कि जो था

फ़िराक़ गोरखपुरी

दिल मिरा शाकी-ए-जफ़ा न हुआ

फ़िगार उन्नावी

तूफ़ाँ से बच के दामन-ए-साहिल में रह गया

फ़िगार उन्नावी

हासिल-ए-ज़ब्त-ए-फ़ुग़ाँ नाकाम है

फ़िगार उन्नावी

तिरी जुस्तुजू में देखा मैं कहाँ कहाँ से गुज़रा

फ़िगार मुरादाबादी

माँगने से हुआ है वो ख़ुद-सर

फ़ज़्ल ताबिश

एक नज़्म

फ़ज़्ल ताबिश

आ के हो जा बे-लिबास

फ़ज़्ल ताबिश

रिश्ता खुजियाया हुआ कुत्ता है

फ़ज़्ल ताबिश

मिलों के शहर में घटता हुआ दिन सोचता होगा

फ़ज़्ल ताबिश

ख़्वाहिशों के हिसार से निकलो

फ़ज़्ल ताबिश

कुछ तो मुझे महबूब तिरा ग़म भी बहुत है

फ़ज़्ल अहमद करीम फ़ज़ली

अस्बाब-ए-ज़िंदगी की हर इक चीज़ है गराँ

फ़ज़्ल अहमद करीम फ़ज़ली

मिरे लिए न रुक सके तो क्या हुआ

फ़ाज़िल जमीली

मैं इक थका हुआ इंसान और क्या करता

फ़ाज़िल जमीली

दरख़्तों के लिए

फ़ाज़िल जमीली

सुख़न जो उस ने कहे थे गिरह से बाँध लिए

फ़ाज़िल जमीली

मुझे उदास कर गए हो ख़ुश रहो

फ़ाज़िल जमीली

मिलने का भी आख़िर कोई इम्कान बनाते

फ़ाज़िल जमीली

ख़ुमार-ए-शब में तिरा नाम लब पे आया क्यूँ

फ़ाज़िल जमीली

तोहफ़ा-ए-ग़म भी मिला दर्द की सौग़ात के बा'द

फ़ाज़िल अंसारी

गुलज़ार में एक फूल भी ख़ंदाँ तो नहीं है

फ़ाज़िल अंसारी

दिल के मकाँ में आँख के आँगन में कुछ न था

फ़ाज़िल अंसारी

अश्क आया आँख में जलता हुआ

फ़ाज़िल अंसारी

ख़ाक में मुझ को मिरी जान मिला रक्खा है

फ़ज़ल हुसैन साबिर

है जो ख़ामोश बुत-ए-होश-रुबा मेरे बाद

फ़ज़ल हुसैन साबिर

ये तमाशा दीदनी ठहरा मगर देखेगा कौन

फ़ज़ा इब्न-ए-फ़ैज़ी

वक़्त ने किस आग में इतना जलाया है मुझे

फ़ज़ा इब्न-ए-फ़ैज़ी

ख़ाक-ए-'शिबली' से ख़मीर अपना भी उट्ठा है 'फ़ज़ा'

फ़ज़ा इब्न-ए-फ़ैज़ी

ऐ 'फ़ज़ा' इतनी कुशादा कब थी मअ'नी की जिहत

फ़ज़ा इब्न-ए-फ़ैज़ी

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