रात Poetry (page 74)

तेरे नाम का तारा जाने कब दिखाई दे

बशीर सैफ़ी

गूँजूँगा तेरे ज़ेहन के गुम्बद में रात-दिन

बशीर सैफ़ी

किसे ख़बर है मैं दिल से कि जाँ से गुज़रूँगा

बशीर सैफ़ी

हब्स के दिनों में भी घर से कब निकलते हैं

बशीर सैफ़ी

इक हुस्न-ए-बे-मिसाल के जो रू-ब-रू हूँ मैं

बशीर सैफ़ी

मैं जितनी देर तिरी याद में उदास रहा

बशीर फ़ारूक़ी

तख़लीक़-ए-काएनात दिगर कर सके तो कर

बशीर फ़ारूक़

फूलों में ग़ज़ल रखना ये रात की रानी है

बशीर बद्र

मैं ने दिन रात ख़ुदा से ये दुआ माँगी थी

बशीर बद्र

मैं तमाम तारे उठा उठा के ग़रीब लोगों में बाँट दूँ

बशीर बद्र

कोई बादल हो तो थम जाए मगर अश्क मिरे

बशीर बद्र

कई साल से कुछ ख़बर ही नहीं

बशीर बद्र

कभी यूँ भी आ मिरी आँख में कि मिरी नज़र को ख़बर न हो

बशीर बद्र

जिस पर हमारी आँख ने मोती बिछाए रात भर

बशीर बद्र

दिल उजड़ी हुई एक सराए की तरह है

बशीर बद्र

चराग़ों को आँखों में महफ़ूज़ रखना

बशीर बद्र

अजीब रात थी कल तुम भी आ के लौट गए

बशीर बद्र

अजब चराग़ हूँ दिन रात जलता रहता हूँ

बशीर बद्र

ज़र्रों में कुनमुनाती हुई काएनात हूँ

बशीर बद्र

उदास रात है कोई तो ख़्वाब दे जाओ

बशीर बद्र

उदास आँखों से आँसू नहीं निकलते हैं

बशीर बद्र

सोए कहाँ थे आँखों ने तकिए भिगोए थे

बशीर बद्र

सोचा नहीं अच्छा बुरा देखा सुना कुछ भी नहीं

बशीर बद्र

रेत भरी है इन आँखों में आँसू से तुम धो लेना

बशीर बद्र

पिछली रात की नर्म चाँदनी शबनम की ख़ुनकी से रचा है

बशीर बद्र

फूल बरसे कहीं शबनम कहीं गौहर बरसे

बशीर बद्र

पत्थर के जिगर वालो ग़म में वो रवानी है

बशीर बद्र

पहला सा वो ज़ोर नहीं है मेरे दुख की सदाओं में

बशीर बद्र

न जी भर के देखा न कुछ बात की

बशीर बद्र

मिरी ज़िंदगी भी मिरी नहीं ये हज़ार ख़ानों में बट गई

बशीर बद्र

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