याद Poetry (page 5)

अगर तुम मोहब्बत हो

ज़ीशान साहिल

अगर आप

ज़ीशान साहिल

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ज़ीशान साहिल

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ज़ीशान साहिल

किसी की देन है लेकिन मिरी ज़रूरत है

ज़ीशान साहिल

कहाँ बशारत-ए-फ़स्ल-ए-बहार लाई थी

ज़िशान इलाही

हम बे-घरों के दिल में जगाती है डर गली

ज़िशान इलाही

मुझे क्यूँ आज हिचकी आ रही है

ज़ेबा

क्यूँकर करूँ मैं तर्क शराब-ओ-कबाब को

ज़ेबा

न होगा हश्र महशर में बपा क्या

ज़ेबा

क्या मिला क़ैस को गर्द-ए-रह-ए-सहरा हो कर

ज़ेबा

उस की राहों में पड़ा मैं भी हूँ कब से लेकिन

ज़ेब ग़ौरी

दिल है कि तिरी याद से ख़ाली नहीं रहता

ज़ेब ग़ौरी

ज़ख़्म पुराने फूल सभी बासी हो जाएँगे

ज़ेब ग़ौरी

वो और मोहब्बत से मुझे देख रहा हो

ज़ेब ग़ौरी

तू पशेमाँ न हो मैं शाद हूँ नाशाद नहीं

ज़ेब ग़ौरी

मुराद-ए-शिकवा नहीं लुत्फ़-ए-गुफ़्तुगू के सिवा

ज़ेब ग़ौरी

ग़ार के मुँह से ये चट्टान हटाने के लिए

ज़ेब ग़ौरी

इक पीली चमकीली चिड़िया काली आँख नशीली सी

ज़ेब ग़ौरी

दिन तिरी याद में ढल जाता है आँसू की तरह

ज़ेब ग़ौरी

तू अपने जैसा अछूता ख़याल दे मुझ को

ज़रीना सानी

बुतों को भूल जाते हैं ख़ुदा को याद करते हैं

ज़रीफ़ लखनवी

मैं रतजगों के मुकम्मल अज़ाब देखूँगा

ज़मान कंजाही

रात का हुस्न भला कब वो समझता होगा

ज़ाकिर ख़ान ज़ाकिर

याद इतना है कि मैं होश गँवा बैठा था

ज़की काकोरवी

वो तिरी ज़ुल्फ़ का साया हो कि आग़ोश तिरा

ज़की काकोरवी

ऐ दिल तिरी आहों में इतना तो असर आए

ज़की काकोरवी

आप पर जब से तबीअत आई

ज़की काकोरवी

हम तुझ से कोई बात भी करने के नहीं थे

ज़करिय़ा शाज़

वहशत में याद आए है ज़ंजीर देख कर

ज़ैनुल आब्दीन ख़ाँ आरिफ़

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