Ghazal Poetry (page 68)
तिरे आशुफ़्ता से क्या हाल-ए-बेताबी बयाँ होगा
वहशत रज़ा अली कलकत्वी
तल्ख़ी-कश-ए-नौमीदी-ए-दीदार बहुत हैं
वहशत रज़ा अली कलकत्वी
सुरूर-अफ़्ज़ा हुई आख़िर शराब आहिस्ता आहिस्ता
वहशत रज़ा अली कलकत्वी
शौक़ फिर कूचा-ए-जानाँ का सताता है मुझे
वहशत रज़ा अली कलकत्वी
शौक़ ने इशरत का सामाँ कर दिया
वहशत रज़ा अली कलकत्वी
शौक़ देता है मुझे पैग़ाम-ए-इश्क़
वहशत रज़ा अली कलकत्वी
शर्मिंदा किया जौहर-ए-बालिग़-नज़री ने
वहशत रज़ा अली कलकत्वी
संग-ए-तिफ़्लाँ फ़िदा-ए-सर न हुआ
वहशत रज़ा अली कलकत्वी
पोशीदा देखती है किसी की नज़र मुझे
वहशत रज़ा अली कलकत्वी
पैमान-ए-वफ़ा-ए-यार हैं हम
वहशत रज़ा अली कलकत्वी
नालों से अगर मैं ने कभी काम लिया है
वहशत रज़ा अली कलकत्वी
नहीं मुमकिन लब-ए-आशिक़ से हर्फ़-ए-मुद्दआ निकले
वहशत रज़ा अली कलकत्वी
नहीं कि इश्क़ नहीं है गुल ओ समन से मुझे
वहशत रज़ा अली कलकत्वी
मुरव्वत का पास और वफ़ा का लिहाज़
वहशत रज़ा अली कलकत्वी
मैं ने माना काम है नाला दिल-ए-नाशाद का
वहशत रज़ा अली कलकत्वी
लुत्फ़-ए-निहाँ से जब जब वो मुस्कुरा दिए हैं
वहशत रज़ा अली कलकत्वी
लूटा है मुझे उस की हर अदा ने
वहशत रज़ा अली कलकत्वी
लगाओ न जब दिल तो फिर क्यूँ लगावट
वहशत रज़ा अली कलकत्वी
लबरेज़-ए-हक़ीक़त गो अफ़साना-ए-मूसा है
वहशत रज़ा अली कलकत्वी
क्या है कि आज चलते हो कतरा के राह से
वहशत रज़ा अली कलकत्वी
किसी तरह दिन तो कट रहे हैं फ़रेब-ए-उम्मीद खा रहा हूँ
वहशत रज़ा अली कलकत्वी
किसी सूरत से उस महफ़िल में जा कर
वहशत रज़ा अली कलकत्वी
किस नाम-ए-मुबारक ने मज़ा मुँह को दिया है
वहशत रज़ा अली कलकत्वी
कहते हो अब मिरे मज़लूम पे बेदाद न हो
वहशत रज़ा अली कलकत्वी
जुदा करेंगे न हम दिल से हसरत-ए-दिल को
वहशत रज़ा अली कलकत्वी
जो तुझ से शोर-ए-तबस्सुम ज़रा कमी होगी
वहशत रज़ा अली कलकत्वी
जान उस की अदाओं पर निकलती ही रहेगी
वहशत रज़ा अली कलकत्वी
हुए हैं गुम जिस की जुस्तुजू में उसी की हम जुस्तुजू करेंगे
वहशत रज़ा अली कलकत्वी
दिल के कहने पे चलूँ अक़्ल का कहना न करूँ
वहशत रज़ा अली कलकत्वी
देखना वो गिर्या-ए-हसरत-मआल आ ही गया
वहशत रज़ा अली कलकत्वी