Ghazal Poetry (page 70)
ग़म के हाथों शुक्र-ए-ख़ुदा है इश्क़ का चर्चा आम नहीं
वहीद क़ुरैशी
तुझ में तो एक ख़ू-ए-जफ़ा और हो गई
वहीद इलाहाबादी
आइए जल्वा-ए-दीदार के दिखलाने को
वहीद इलाहाबादी
ज़बान-ए-ख़ल्क़ पे आया तो इक फ़साना हुआ
वहीद अख़्तर
उन को रोज़ इक ताज़ा हीला एक ख़ंजर चाहिए
वहीद अख़्तर
उम्र को करती हैं पामाल बराबर यादें
वहीद अख़्तर
तुम गए साथ उजालों का भी झूटा ठहरा
वहीद अख़्तर
तू ग़ज़ल बन के उतर बात मुकम्मल हो जाए
वहीद अख़्तर
सहराओं में दरिया भी सफ़र भूल गया है
वहीद अख़्तर
सफ़र ही बाद-ए-सफ़र है तो क्यूँ न घर जाऊँ
वहीद अख़्तर
रुख़्सत-ए-नुत्क़ ज़बानों को रिया क्या देगी
वहीद अख़्तर
रहे वो ज़िक्र जो लब-हा-ए-आतिशीं से चले
वहीद अख़्तर
रात भर ख़्वाब के दरिया में सवेरा देखा
वहीद अख़्तर
लिपटी हुई फिरती है नसीम उन की क़बा से
वहीद अख़्तर
क्यूँ तिरी क़ंद-लबी ख़ुश-सुख़नी याद आई
वहीद अख़्तर
ख़ुश्बू है कभी गुल है कभी शम्अ कभी है
वहीद अख़्तर
कतरा के गुल्सिताँ से जो सू-ए-क़फ़स चले
वहीद अख़्तर
कहीं शुनवाई नहीं हुस्न की महफ़िल के ख़िलाफ़
वहीद अख़्तर
जिस को माना था ख़ुदा ख़ाक का पैकर निकला
वहीद अख़्तर
हम ने देखा है मोहब्बत का सज़ा हो जाना
वहीद अख़्तर
हम को मंज़ूर तुम्हारा जो न पर्दा होता
वहीद अख़्तर
हम जो टूटे तो ग़म-ए-दहर का पैमाना बने
वहीद अख़्तर
इक दश्त-ए-बे-अमाँ का सफ़र है चले-चलो
वहीद अख़्तर
दीवानों को मंज़िल का पता याद नहीं है
वहीद अख़्तर
दफ़्तर-ए-लौह ओ क़लम या दर-ए-ग़म खुलता है
वहीद अख़्तर
अँधेरा इतना नहीं है कि कुछ दिखाई न दे
वहीद अख़्तर
आँख जो नम हो वही दीदा-ए-तर मेरा है
वहीद अख़्तर
आग अपने ही दामन की ज़रा पहले बुझा लो
वहीद अख़्तर
थकावटों से बैठ के सफ़र उतारिए कहीं
वहाब दानिश
ख़ाक के पुतलों में पत्थर के बदन को वास्ता
वहाब दानिश