Ghazal Poetry (page 72)

दीवार-ओ-दर सा चाहिए दीवार-ओ-दर मुझे

विशाल खुल्लर

आग दरिया को इशारों से लगाने वाला

विशाल खुल्लर

वक़्त की ताक़ पे दोनों की सजाई हुई रात

विपुल कुमार

जुनूँ के बाब में अब के ये राएगानी हो

विपुल कुमार

जल्द आएँ जिन्हें सीने से लगाना है मुझे

विपुल कुमार

इस ख़राबी की कोई हद है कि मेरे घर से

विपुल कुमार

हर मुलाक़ात पे सीने से लगाने वाले

विपुल कुमार

फ़र्ज़-ए-सुपुर्दगी में तक़ाज़े नहीं हुए

विपुल कुमार

दिलों पे दर्द का इम्कान भी ज़ियादा नहीं

विपुल कुमार

या तिरी आरज़ू सा हो जाऊँ

विनीत आश्ना

उम्र-भर उस की निशानी देखिए

विनीत आश्ना

इक-दूजे में भी तो रहा जा सकता है

विनीत आश्ना

और सब कुछ बहाल रक्खा है

विनीत आश्ना

अजब सी आज-कल मैं इक परेशानी में हूँ यारो

विनीत आश्ना

जीवन है पल पल की उलझन किस किस पल की बात करें

विलास पंडित मुसाफ़िर

इक समुंदर के हवाले सारे ख़त करता रहा

विलास पंडित मुसाफ़िर

एक भी क़तरा न छोड़ा कीजिए

विलास पंडित मुसाफ़िर

अपनी तो गुज़री है अक्सर अपनी ही मन-मानी में

विलास पंडित मुसाफ़िर

ज़िंदगी की हँसी उड़ाती हुई

विकास शर्मा राज़

ज़र्रों की बातों में आने वाला था

विकास शर्मा राज़

ज़रा लौ चराग़ की कम करो मिरा दुख है फिर से उतार पर

विकास शर्मा राज़

वो निहत्ता नहीं अकेला है

विकास शर्मा राज़

उसे छुआ ही नहीं जो मिरी किताब में था

विकास शर्मा राज़

सर-ए-अफ़्लाक बिछा चाहती है

विकास शर्मा राज़

सब के आगे नहीं बिखरना है

विकास शर्मा राज़

रोज़ ये ख़्वाब डराता हैं मुझे

विकास शर्मा राज़

रात की ग़ार में उतरने का

विकास शर्मा राज़

रात भर बर्फ़ गिरती रही है

विकास शर्मा राज़

क़ाफ़िले से अलग चले हम लोग

विकास शर्मा राज़

फिर वही शब वही सितारा है

विकास शर्मा राज़