Ghazal Poetry (page 73)

न हम-सफ़र है न हम-नवा है

विकास शर्मा राज़

मुसाफ़िरों के लिए साज़गार थोड़ी है

विकास शर्मा राज़

मंज़िलों से भी आगे निकलता हुआ

विकास शर्मा राज़

कोई उस के बराबर हो गया है

विकास शर्मा राज़

कई सम्तों में रस्ता बट रहा है

विकास शर्मा राज़

जुनूँ की पैरवी से ख़ुश नहीं हूँ

विकास शर्मा राज़

हवा के वार पे अब वार करने वाला है

विकास शर्मा राज़

हवा के साथ यारी हो गई है

विकास शर्मा राज़

हवा बहने लगी मुझ में

विकास शर्मा राज़

हाथ पर हाथ रख के क्यूँ बैठूँ

विकास शर्मा राज़

हाँ वफ़ाओं का मेरी ध्यान भी था

विकास शर्मा राज़

फ़िक्र का कारोबार था मुझ में

विकास शर्मा राज़

फ़सील-ए-शब पे तारों ने लिखा क्या

विकास शर्मा राज़

दिल-खंडर में खड़े हुए हैं हम

विकास शर्मा राज़

दश्त की ख़ाक भी छानी है

विकास शर्मा राज़

दाग़ होने लगे ज़ाहिर मेरे

विकास शर्मा राज़

बारिश में अक्सर ऐसा हो जाता है

विकास शर्मा राज़

अज़ल से बंद दरवाज़ा खुला तो

विकास शर्मा राज़

अब रवानी से है नजात मुझे

विकास शर्मा राज़

उस गली तक सड़क रही होगी

विजय शर्मा अर्श

तिरे ग़ुरूर मिरे ज़ब्त का सवाल रहा

विजय शर्मा अर्श

शहर बेज़ार रहगुज़र तन्हा

विजय शर्मा अर्श

रही है यूँ ही नदामत मुझे मुक़द्दर से

विजय शर्मा अर्श

नम आँखों में क्या कर लेगा ग़ुस्सा देखेंगे

विजय शर्मा अर्श

मिरी वफ़ा की मुकम्मल तू दास्ताँ कर दे

विजय शर्मा अर्श

किसी सूखे हुए शजर सा हूँ

विजय शर्मा अर्श

जिस भी जगह देखी उस ने अपनी तस्वीर हटा ली थी

विजय शर्मा अर्श

दर पे तेरे जो सर झुका लूँगा

विजय शर्मा अर्श

बीते वक़्त का चेहरा ढूँढता रहता है

विजय शर्मा अर्श

बारा चाँद गए पूनम के प्यार भरा इक सावन भी

विजय शर्मा अर्श