Ghazal Poetry (page 75)

मुमकिन नहीं है अपने को रुस्वा वफ़ा करे

वफ़ा बराही

हक़ीक़त से जो आश्ना हो गया

वफ़ा बराही

कुछ तो मोहब्बतों की वफ़ाएँ निभाऊँ मैं

उषा भदोरिया

हम कभी ख़ुद से कोई बात नहीं कर पाते

उषा भदोरिया

एक आश्ना अक्सर पास से गुज़रता है

उषा भदोरिया

अँधेरी शब में चराग़-ए-रह-ए-वफ़ा देना

उषा भदोरिया

अक्सर तन्हाई से मिल कर रोए हैं

उषा भदोरिया

अक्सर मिरी ज़मीं ने मिरे इम्तिहाँ लिए

उषा भदोरिया

आसमाँ से सहीफ़े उतरते रहे

उषा भदोरिया

आइने से बात करना इतना आसाँ भी नहीं

उषा भदोरिया

सौ बातों की बात है प्यारे वो जो ज़ात में होती है

उरूज ज़ेहरा ज़ैदी

मानता नहीं मेरी हुज्जतें भी करता है

उरूज ज़ेहरा ज़ैदी

जो नहीं मुमकिन कभी मुमकिन वो होना चाहिए

उरूज ज़ेहरा ज़ैदी

हो तिरा इश्क़ मिरी ज़ात का मेहवर जैसे

उरूज ज़ेहरा ज़ैदी

एक दो अश्क बहाती है चली जाती है

उरूज ज़ेहरा ज़ैदी

रफ़्ता रफ़्ता दिल-ए-बे-ताब ठहर जाएगा

उरूज ज़ैदी बदायूनी

किसे बताऊँ कि ग़म क्या है सरख़ुशी क्या है

उरूज ज़ैदी बदायूनी

काश उस बुत को भी हम वक़्फ़-ए-तमन्ना देखें

उरूज ज़ैदी बदायूनी

इश्क़ के हाथों में परचम के सिवा कुछ भी नहीं

उरूज ज़ैदी बदायूनी

हर क़दम पर मुझे लग़्ज़िश का गुमाँ होता है

उरूज ज़ैदी बदायूनी

अश्क पर गुदाज़-दिल हाशिया चढ़ाता है

उरूज ज़ैदी बदायूनी

राह जो चलनी है उस में ख़ूबियाँ कोई नहीं

उर्मिलामाधव

किस तरह भूले तिरे अल्फ़ाज़-ए-बेजा क्या करूँ

उर्मिलामाधव

ख़ुद सवाल-ओ-जवाब करते रहो

उर्मिलामाधव

ख़ुद के एहसास-ए-मोहब्बत ने मुझे ज़िंदा रखा

उर्मिलामाधव

जाने किस किस ने हमें ताकीद की

उर्मिलामाधव

ढूँढिए इस शहर में अब किस को हासिल कौन है

उर्मिलामाधव

वो ध्यान की राहों में जहाँ हम को मिलेगा

उर्फ़ी आफ़ाक़ी

सबा से आती है कुछ बू-ए-आश्ना मुझ को

उर्फ़ी आफ़ाक़ी

रवाँ दवाँ सू-ए-मंज़िल है क़ाफ़िला कि जो था

उर्फ़ी आफ़ाक़ी