Ghazal Poetry (page 77)

हम हैं बस इतने ही साहिल-आश्ना

उम्मीद फ़ाज़ली

हिजाब उट्ठे हैं लेकिन वो रू-ब-रू तो नहीं

उम्मीद फ़ाज़ली

हाए इक शख़्स जिसे हम ने भुलाया भी नहीं

उम्मीद फ़ाज़ली

इक ऐसा मरहला-ए-रह-गुज़र भी आता है

उम्मीद फ़ाज़ली

ऐ दिल-ए-ख़ुद-ना-शनास ऐसा भी क्या

उम्मीद फ़ाज़ली

आईना-ए-वहशत को जिला जिस से मिली है

उम्मीद फ़ाज़ली

ज़ेहन के कैनवस को फैला कर

उमर फ़रहत

सफ़र की हद थी जो रात थी

उमर फ़रहत

जब भी पेड़ों पे समर जागता है

उमर फ़रहत

मुझे मेहमाँ ही जानो रात भर का

उमर अंसारी

लड़ जाते हैं सरों पे मचलती क़ज़ा से भी

उमर अंसारी

कर अपनी बात कि प्यारे किसी की बात से क्या

उमर अंसारी

जिस आईने में भी झाँका नज़र उसी से मिली

उमर अंसारी

हो के उस कूचे से आई तो सितम ढा गई क्या

उमर अंसारी

हर इक का दर्द उसी आशुफ़्ता-सर में तन्हा था

उमर अंसारी

हैं सारे जुर्म जब अपने हिसाब में लिखना

उमर अंसारी

बाहर बाहर सन्नाटा है अंदर अंदर शोर बहुत

उमर अंसारी

मिरी भँवों के ऐन दरमियान बन गया

उमैर नजमी

खेल दोनों का चले तीन का दाना न पड़े

उमैर नजमी

एक तारीख़ मुक़र्रर पे तो हर माह मिले

उमैर नजमी

दाएँ बाज़ू में गड़ा तीर नहीं खींच सका

उमैर नजमी

बड़े तहम्मुल से रफ़्ता रफ़्ता निकालना है

उमैर नजमी

ख़ुद को हर रोज़ इम्तिहान में रख

उमैर मंज़र

कभी इक़रार होना था कभी इंकार होना था

उमैर मंज़र

जब इंसान को अपना कुछ इदराक हुआ

उमैर मंज़र

इल्म ओ फ़न के राज़-ए-सर-बस्ता को वा करता हुआ

उमैर मंज़र

हर बार ही मैं जान से जाने में रह गया

उमैर मंज़र

बना के वहम ओ गुमाँ की दुनिया हक़ीक़तों के सराब देखूँ

उमैर मंज़र

दिल की जो आग थी कम उस को भी होने न दिया

उमा शंकर चित्रवंशी बाज़ल

निगाहें नीची रखते हैं बुलंदी के निशाँ वाले

तुर्फ़ा क़ुरैशी