Ghazal Poetry (page 79)
दिन में सूरज है मिरी महरूमियों का तर्जुमाँ
तिश्ना बरेलवी
चमन में बर्क़ कभी आशियाँ से दूर नहीं
तिश्ना बरेलवी
ज़हे क़िस्मत अगर तुम को हमारा दिल पसंद आया
तिलोकचंद महरूम
ये किस से आज बरहम हो गई है
तिलोकचंद महरूम
वो दिल कहाँ है अहल-ए-नज़र दिल कहें जिसे
तिलोकचंद महरूम
वो आई शाम-ए-ग़म वक़्फ़-ए-बला होने का वक़्त आया
तिलोकचंद महरूम
वही अरमान जैसे जी जो मुश्किल से निकलते हैं
तिलोकचंद महरूम
ताइर-ए-दिल के लिए ज़ुल्फ़ का जाल अच्छा है
तिलोकचंद महरूम
सितम कोई नया ईजाद करना
तिलोकचंद महरूम
शहर से एक तरफ़ दूर बहुत
तिलोकचंद महरूम
नज़र उठा दिल-ए-नादाँ ये जुस्तुजू क्या है
तिलोकचंद महरूम
क्या सुनाएँ किसी को हाल अपना
तिलोकचंद महरूम
किसी की याद को हम ज़ीस्त का हासिल समझते हैं
तिलोकचंद महरूम
ख़ुदा से वक़्त-ए-दुआ हम सवाल कर बैठे
तिलोकचंद महरूम
ख़िज़ाँ से पेशतर सारा चमन बर्बाद होता है
तिलोकचंद महरूम
काविशों से अमाँ मिले न मिले
तिलोकचंद महरूम
कम न थी सहरा से कुछ भी ख़ाना-वीरानी मिरी
तिलोकचंद महरूम
इस का गिला नहीं कि दुआ बे-असर गई
तिलोकचंद महरूम
होते हैं ख़ुश किसी की सितम-रानियों से हम
तिलोकचंद महरूम
हिज्राँ की शब जो दर्द के मारे उदास हैं
तिलोकचंद महरूम
हमारे वास्ते है एक जीना और मर जाना
तिलोकचंद महरूम
हैरत-ज़दा मैं उन के मुक़ाबिल में रह गया
तिलोकचंद महरूम
ग़लत की हिज्र में हासिल मुझे क़रार नहीं
तिलोकचंद महरूम
फ़ित्ना-आरा शोरिश-ए-उम्मीद है मेरे लिए
तिलोकचंद महरूम
दस्त-ए-ख़िरद से पर्दा-कुशाई न हो सकी
तिलोकचंद महरूम
बाइस-ए-इम्बिसात हो आमद-ए-नौ-बहार क्या
तिलोकचंद महरूम
बदनाम हूँ पर आशिक़-ए-बदनाम तुम्हारा
तिलोकचंद महरूम
मुस्कुराते हुए फूलों का अरक़ सब का है
तिलक राज पारस
दिल है बेताब नज़र खोई हुई लगती है
तिलक राज पारस
हर इक के दुख पे जो अहल-ए-क़लम तड़पता था
तिफ़्ल दारा