Ghazal Poetry (page 80)
वो अव्वलीं दर्द की गवाही सजी हुई बज़्म-ए-ख़्वाब जैसे
तौसीफ़ तबस्सुम
वाहिमा होगा यहाँ कोई न आया होगा
तौसीफ़ तबस्सुम
तुम अच्छे थे तुम को रुस्वा हम ने किया
तौसीफ़ तबस्सुम
था पस-ए-मिज़्गान-तर इक हश्र बरपा और भी
तौसीफ़ तबस्सुम
सुनो कवी तौसीफ़ तबस्सुम इस दुख से क्या पाओगे
तौसीफ़ तबस्सुम
मेरी सूरत साया-ए-दीवार-ओ-दर में कौन है
तौसीफ़ तबस्सुम
मेरी सूरत साया-ए-दीवार-ओ-दर में कौन है
तौसीफ़ तबस्सुम
मरते मरते रौशनी का ख़्वाब तो पूरा हुआ
तौसीफ़ तबस्सुम
क्या बताऊँ कि है किस ज़ुल्फ़ का सौदा मुझ को
तौसीफ़ तबस्सुम
कितने ही तीर ख़म-ए-दस्त-ओ-कमाँ में होंगे
तौसीफ़ तबस्सुम
काश इक शब के लिए ख़ुद को मयस्सर हो जाएँ
तौसीफ़ तबस्सुम
इस पार जहान-ए-रफ़्तगाँ है
तौसीफ़ तबस्सुम
गर्द-आलूद दरीदा चेहरा यूँ है माह ओ साल के ब'अद
तौसीफ़ तबस्सुम
इक तीर नहीं क्या तिरी मिज़्गाँ की सफ़ों में
तौसीफ़ तबस्सुम
दिल था पहलू में तो कहते थे तमन्ना क्या है
तौसीफ़ तबस्सुम
दिल की बात न मानी होती इश्क़ किया क्यूँ पीरी में
तौसीफ़ तबस्सुम
बजा कि दरपय-ए-आज़ार चश्म-ए-तर है बहुत
तौसीफ़ तबस्सुम
अजीब रंग थे दिल में जो आँसुओं में न थे
तौसीफ़ तबस्सुम
आख़िर ख़ुद अपने ही लहू में डूब के सर्फ़-ए-विग़ा होगे
तौसीफ़ तबस्सुम
आइना मिलता तो शायद नज़र आते ख़ुद को
तौसीफ़ तबस्सुम
याद और ग़म की रिवायात से निकला हुआ है
तौक़ीर तक़ी
सूरत-ए-इश्क़ बदलता नहीं तू भी मैं भी
तौक़ीर तक़ी
रूठ कर आँख के अंदर से निकल जाते हैं
तौक़ीर तक़ी
परी उड़ जाएगी और राजधानी ख़त्म होगी
तौक़ीर तक़ी
मौज-ए-ख़याल में न किसी जल-परी में आए
तौक़ीर तक़ी
लफ़्ज़ की क़ैद से रिहा हो जा
तौक़ीर तक़ी
कोई तासीर तो है इस की नवा में ऐसी
तौक़ीर तक़ी
ख़ाक होती हुई हस्ती से उठा
तौक़ीर तक़ी
कहीं शुऊर में सदियों का ख़ौफ़ ज़िंदा था
तौक़ीर तक़ी
दर्द जब से दिल-नशीं है इश्क़ है
तौक़ीर तक़ी