Ghazal Poetry (page 82)
इस बार हुआ कुन का असर और तरह का
तसनीम आबिदी
हुए हो किस लिए बरहम अज़ीज़म
तसनीम आबिदी
हमारी क़ुर्बतों में फ़ासला न रह जाए
तसनीम आबिदी
एक सन्नाटा सा तक़रीर में रक्खा गया था
तसनीम आबिदी
बे-तलब कर के ज़रूरत भी चली जाए अगर
तसनीम आबिदी
ज़मीं पर सर-निगूँ बैठा हुआ हूँ
तस्लीम इलाही ज़ुल्फ़ी
ये कैसी सुब्ह हुई कैसा ये सवेरा है
तस्लीम इलाही ज़ुल्फ़ी
किसी दयार किसी दश्त में सबा ले चल
तस्लीम इलाही ज़ुल्फ़ी
ख़्वाब पहले ले गया फिर रत-जगा भी ले गया
तस्लीम इलाही ज़ुल्फ़ी
कौन है नेक कौन बद है यहाँ
तस्लीम इलाही ज़ुल्फ़ी
जैसे कश्ती और उस पर बादबाँ फैले हुए
तस्लीम इलाही ज़ुल्फ़ी
जैसे कश्ती और इस पर बादबाँ फैले हुए
तस्लीम इलाही ज़ुल्फ़ी
अब ख़ाना-ब-दोशों का पता है न ख़बर है
तस्लीम इलाही ज़ुल्फ़ी
मिल जाए अमाँ दुनिया में पल भर नहीं लगता
तस्लीम अहमद तसव्वुर
उस कू मैं हुए हम वो लब-ए-बाम न आया
मीर तस्कीन देहलवी
तुम ग़ैर से मिलो न मिलो मैं तो छोड़ दूँ
मीर तस्कीन देहलवी
तू क्यूँ पास से उठ चला बैठे बैठे
मीर तस्कीन देहलवी
रहने वालों को तिरे कूचे के ये क्या हो गया
मीर तस्कीन देहलवी
नाम लोगे जो याँ से जाने का
मीर तस्कीन देहलवी
क्या क्या मज़े से रात की अहद-ए-शबाब में
मीर तस्कीन देहलवी
कर सके दफ़्न न उस कूचे में अहबाब मुझे
मीर तस्कीन देहलवी
हुए थे भाग के पर्दे में तुम निहाँ क्यूँकर
मीर तस्कीन देहलवी
गर मेरे बैठने से वो आज़ार खींचते
मीर तस्कीन देहलवी
फ़र्क़ कुछ तो चाहिए अग़्यार से
मीर तस्कीन देहलवी
दिल किस की तेग़-ए-नाज़ से लज़्ज़त-चशीदा है
मीर तस्कीन देहलवी
बे-मेहर कहते हो उसे जो बेवफ़ा नहीं
मीर तस्कीन देहलवी
वो कोई सच था या झूटा कोई फ़साना था
तासीर सिद्दीक़ी
थम थम के बारिशें अब जल्वा दिखा रही हैं
तासीर सिद्दीक़ी
तेरी वफ़ा का हम को गुमाँ इस क़दर हुआ
तासीर सिद्दीक़ी
लगा के ग़ोता समुंदर में तुम गुहर ढूँडो
तासीर सिद्दीक़ी