Ghazal Poetry (page 84)

ज़ेहन पर बोझ रहा, दिल भी परेशान हुआ

तारिक़ क़मर

ये रोज़-ओ-शब की मसाफ़त ये आना जाना मिरा

तारिक़ क़मर

ये आरज़ू थी उसे आइना बनाते हम

तारिक़ क़मर

वो मेरे ख़्वाब की ताबीर तो बताए मुझे

तारिक़ क़मर

उस ने इक बार भी पूछा नहीं कैसा हूँ मैं

तारिक़ क़मर

सारे ज़ख़्मों को ज़बाँ मिल गई ग़म बोलते हैं

तारिक़ क़मर

रेआया ज़ुल्म पे जब सर उठाने लगती है

तारिक़ क़मर

पाँव जब हो गए पत्थर तो सदा दी उस ने

तारिक़ क़मर

नज़र नज़र से मिला कर कलाम कर आया

तारिक़ क़मर

न तुम मिले थे तो दुनिया चराग़-पा भी न थी

तारिक़ क़मर

ख़ुश्क आँखों से कहाँ तय ये मसाफ़त होगी

तारिक़ क़मर

कौन सा मैं जवाज़ दूँ सूरत-ए-हाल के लिए

तारिक़ क़मर

कैसे रिश्तों को समेटें ये बिखरते हुए लोग

तारिक़ क़मर

एक तस्वीर जलानी है अभी

तारिक़ क़मर

देखें कितने चाहने वाले निकलेंगे

तारिक़ क़मर

चश्म-ए-बीना! तिरे बाज़ार का मेआर हैं हम

तारिक़ क़मर

बड़ी हवेली के तक़्सीम जब उजाले हुए

तारिक़ क़मर

अपनी पलकों के शबिस्तान में रक्खा है तुम्हें

तारिक़ क़मर

निकले लोग सफ़र पर शब के जंगल में

तारिक़ पीरज़ादा

ये ख़याल था कभी ख़्वाब में तुझे देखते

तारिक़ नईम

वो ख़ुद गया है उस का असर तो नहीं गया

तारिक़ नईम

तुझ को इस तरह कहाँ छोड़ के जाना था हमें

तारिक़ नईम

सारी तरतीब-ए-ज़मानी मिरी देखी हुई है

तारिक़ नईम

पोशीदा किसी ज़ात में पहले भी कहीं था

तारिक़ नईम

फिर इस से क़ब्ल कि बार-ए-दिगर बनाया जाए

तारिक़ नईम

मुझे ज़िंदगी से ख़िराज ही नहीं मिल रहा

तारिक़ नईम

मिरी निगाह किसी ज़ाविए पे ठहरे भी

तारिक़ नईम

मैं आ रहा था सितारों पे पाँव धरते हुए

तारिक़ नईम

जीना क्या है पिछ्ला क़र्ज़ उतार रहा हूँ

तारिक़ नईम

इस रात किसी और क़लम-रौ में कहीं था

तारिक़ नईम