Ghazal Poetry (page 83)
दिल को क़रार मिलता है अक्सर चुभन के बा'द
तासीर सिद्दीक़ी
चलो के मिल के बदल देते हैं समाजों को
तासीर सिद्दीक़ी
अच्छे हैं फ़ासले के ये तारे सजाते हैं
तासीर सिद्दीक़ी
ज़ेहन में हो कोई मंज़िल तो नज़र में ले जाऊँ
तसव्वुर ज़ैदी
वो हम से क्यूँ अलग था क्यूँ दुखी था
तसव्वुर ज़ैदी
पत्थरों पर नक़्श उभरा क्यूँ नहीं
तसव्वुर ज़ैदी
इतना मुझे ख़ुदा मिरे मशहूर तू न कर
तरुणा मिश्रा
भटकें हैं आप के लिए तन्हा कहाँ कहाँ
तरुणा मिश्रा
अश्क टपकें लाख होंटों की हँसी जाती नहीं
तरुणा मिश्रा
आज ख़ुद को तबाह कर लेंगे
तरुणा मिश्रा
ये जो है ताना-बाना होगा क्या
तरकश प्रदीप
तू मेरा दोस्त मिरा यार है नहीं है क्या
तरकश प्रदीप
पागल वहशी तन्हा तन्हा उजड़ा उजड़ा दिखता हूँ
तरकश प्रदीप
मुझे पता है बस इतना कि प्यार करना है
तरकश प्रदीप
मैं रोज़-ए-हिज्र को बरबाद करता रहता हूँ
तरकश प्रदीप
कोई रखता ही नहीं फिर भी रहा करता है
तरकश प्रदीप
ख़ूब मुश्किल है पर आसान लिया जाता है
तरकश प्रदीप
करते हुए तवाफ़ ख़यालात-ए-यार मैं
तरकश प्रदीप
काम कुछ ऐसे कर गया हूँ मैं
तरकश प्रदीप
इश्क़ में अब तो मर ही सकता हूँ
तरकश प्रदीप
अपने दम से गुज़र औक़ात नहीं करता मैं
तरकश प्रदीप
ऐ मेरे दिल तू बता तुझ को गवारा क्या है
तरकश प्रदीप
तू कहाँ है मुझे ओ ख़्वाब दिखाने वाले
तारिक़ राशीद दरवेश
नमी आँखों की बादा हो गई है
तारिक़ राशीद दरवेश
मेरा ग़म सारी काएनात का ग़म
तारिक़ राशीद दरवेश
कौन से दिल से किन आँखों ये तमाशा देखूँ
तारिक़ राशीद दरवेश
जीना अब दुश्वार है बाबा
तारिक़ राशीद दरवेश
बाक़ी सब कुछ फ़ानी है
तारिक़ राशीद दरवेश
अच्छे लगोगे और भी इतना किया करो
तारिक़ राशीद दरवेश
आज इस वक़्त वो जब याद आया
तारिक़ राशीद दरवेश