Ghazal Poetry (page 85)
हवा में आए तो लौ भी न साथ ली हम ने
तारिक़ नईम
हवा का हुक्म भी अब के नज़र में रक्खा जाए
तारिक़ नईम
दर-ओ-बस्त-ए-अनासिर पारा पारा होने वाला है
तारिक़ नईम
ब-नाम-ए-इश्क़ यही एक काम करते हैं
तारिक़ नईम
अजीब दर्द का रिश्ता था सब के सब रोए
तारिक़ नईम
ऐसी तक़्सीम की सूरत निकल आई घर में
तारिक़ नईम
अगर कुछ भी मिरे घर से दम-ए-रुख़्सत निकलता है
तारिक़ नईम
अब ये हंगामा-ए-दुनिया नहीं देखा जाता
तारिक़ नईम
आज किस ख़्वाब की ताबीर नज़र आई है
तारिक़ नईम
यहाँ के लोग हैं बस अपने ही ख़याल में गुम
तारिक़ मतीन
निगहबान-ए-चमन अब धूप और पानी से क्या होगा
तारिक़ मतीन
मैं हबीब हूँ किसी और का मिरी जान-ए-जाँ कोई और है
तारिक़ मतीन
कोई है बाम पर देखा तो जाए
तारिक़ मतीन
घर में बैठूँ तो शनासाई बुरा मानती है
तारिक़ मतीन
ग़म की दीवार को मैं ज़ेर-ओ-ज़बर कर न सका
तारिक़ मतीन
अपने दुखों का हम ने तमाशा नहीं किया
तारिक़ मतीन
लहू को पालते फिरते हैं हम हिना की तरह
तारिक़ मसऊद
उस के बदन का लम्स अभी उँगलियों में है
तारिक़ जामी
तेज़ लहजे की अनी पर न उठा लें ये कहीं
तारिक़ जामी
सरसब्ज़ थे हुरूफ़ प लहजे में हब्स था
तारिक़ जामी
मैं बाम-ओ-दर पे जो अब साएँ साएँ लिखता हूँ
तारिक़ जामी
मैं बाम-ओ-दर पे जो अब साएँ साएँ लिखता हूँ
तारिक़ जामी
डूबा हूँ तो किस शख़्स का चेहरा नहीं उतरा
तारिक़ जामी
लब-ए-ख़मोश मिरा बात से ज़ियादा है
तारिक़ हाश्मी
वही आहटें दर-ओ-बाम पर वही रत-जगों के अज़ाब हैं
तारिक़ बट
नज़र का नश्शा बदन का ख़ुमार टूट गया
तारिक़ बट
कुछ दूर तक तो इस की सदा ले गई मुझे
तारिक़ बट
है किस का इंतिज़ार खुला घर का दर भी है
तारिक़ बट
बुझे तो दिल भी थे पर अब दिमाग़ बुझने लगे
तारिक़ बट
भूली हुई राहों का सफ़र कैसा लगेगा
तारिक़ बट