Ghazal Poetry (page 74)
बातों बातों में ही उनवान बदल जाते हैं
विजय शर्मा अर्श
अब कहाँ दर्द जिस्म-ओ-जान में है
विजय शर्मा अर्श
इश्क़ ने बरबाद कर दी ज़िंदगी हाए रे इश्क़
विजय अरुण
उठ रहा है दम-ब-दम डर का धुआँ
वसाफ़ बासित
महताब फ़ज़ा के आइने में
वसाफ़ बासित
एक तस्वीर जो तश्कील नहीं हो पाई
वसाफ़ बासित
धूप शजर को गीत सुनाए आती है
वसाफ़ बासित
अंदरूँ नींद का इक ख़ाली मकाँ होता था
वसाफ़ बासित
ये क़दम क़दम कशाकश दिल बे-क़रार क्या है
वारिस किरमानी
उजड़ के घर से सर-ए-राह आ के बैठे हैं
वारिस किरमानी
क़ज़ा जो दे तो इलाही ज़रा बदल के मुझे
वारिस किरमानी
लाख नादाँ हैं मगर इतनी सज़ा भी न मिले
वारिस किरमानी
खोए हुए सहरा तक ऐ बाद-ए-सबा जाना
वारिस किरमानी
जी में है इक दिन झूम कर उस शोख़ को सज्दा करूँ
वारिस किरमानी
जमाल-ए-नस्तरनी रंग-ओ-बू-ए-यासमनी
वारिस किरमानी
बहुत दिनों में हम उन से जो हम-कलाम हुए
वारिस किरमानी
ऐ सबा निकहत-ए-गेसू-ए-मुअंबर लाना
वारिस किरमानी
आशिक़ हुए तो इश्क़ में होश्यार क्यूँ न थे
वारिस किरमानी
आख़िर वो इज़्तिराब के दिन भी गुज़र गए
वारिस किरमानी
सीने के दाग़ उन को दिखाए न जा सके
वली मदनी
फैला न यूँ ख़ुलूस की चादर मिरे लिए
वली मदनी
हवा-ए-शोख़ की आख़िर फ़ुसूँ कारी ये कैसी है
वली मदनी
फ़सील-ए-रेग पर इतना भरोसा कर लिया तुम ने
वली मदनी
दिल प्यार के रिश्तों से मुकर भी नहीं जाता
वली मदनी
बना कर ख़ुद को जिस ने इक भला इंसान रक्खा है
वली मदनी
बहुत टूटा हूँ लेकिन हौसला ज़िंदा बहुत कुछ है
वली मदनी
ज़मीं से आसमाँ तक आसमाँ से ला-मकाँ तक है
वहशी कानपुरी
तमाम रात वो जागा किसी के वा'दे पर
वफ़ा मलिकपुरी
नई सहर है ये लोगो नया सवेरा है
वफ़ा मलिकपुरी
वही हादसों के क़िस्से वही मौत की कहानी
वफ़ा बराही