Ghazal Poetry (page 71)
कई भयानक काली रातों के अँधियारे में
वहाब दानिश
हर रौशनी की बूँद पे लब रख चुकी है रात
वहाब दानिश
ये कश्मकश-ए-मुनइ'म-ओ-नादार कहाँ तक
वफ़ा सिद्दीक़ी
वफ़ा की मंज़िलों को हम ने इस तरह सजा लिया
वफ़ा सिद्दीक़ी
क़ुर्ब-ए-मंज़िल टूट जाए हौसला अच्छा नहीं
वफ़ा सिद्दीक़ी
तुम ने हमारा साथ दिया तो ख़ुद को हम पा जाएँगे
विश्वनाथ दर्द
तन्हाई में दिखते लम्हे जब कुछ याद दिलाते हैं
विश्वनाथ दर्द
जिस जगह भी मिला घना साया
विश्वनाथ दर्द
जाने कितना जीवन पीछे छूट गया अनजाने में
विश्वनाथ दर्द
हम ने घटता-बढ़ता साया पग-पग चल कर देखा है
विश्वनाथ दर्द
हम ने अपने आप से जब बात की
विश्वनाथ दर्द
हैं किस लिए उदास कोई पूछता नहीं
विश्वनाथ दर्द
बहुत उकता गया हूँ अपने जी से
विश्वनाथ दर्द
अगर कुछ मोड़ रस्ते में न आते
विश्वनाथ दर्द
अब तो सोच लिया है यारो दिल का ख़ूँ हो जाने दूँ
विश्वनाथ दर्द
अब हम चराग़ बन के सर-ए-राह जल उठे
विश्वनाथ दर्द
तख़्त-ए-ताऊस मिरा तख़्त-ए-हज़ारा तुम हो
विश्मा ख़ान विश्मा
सुकूत-ए-शब सितारों से हवा जब बात करती है
विश्मा ख़ान विश्मा
सय्याद आ गए हैं सभी एक घात पर
विश्मा ख़ान विश्मा
कुछ लोग दिल की आड़ में रू-पोश हो गए
विश्मा ख़ान विश्मा
करना है कार-ए-ख़ैर तो फिर सर न देखना
विश्मा ख़ान विश्मा
हुस्न और प्यार तिरे पास मैं ले आई हूँ
विश्मा ख़ान विश्मा
उस एक शख़्स का कोई पता नहीं मिलता
विशाल खुल्लर
तिरी जब नींद का दफ़्तर खुला था
विशाल खुल्लर
न दरमियाँ न कहीं इब्तिदा में आया है
विशाल खुल्लर
मेरे दुख की दवा भी रखता है
विशाल खुल्लर
मेरा वहम-ओ-गुमान रहने दे
विशाल खुल्लर
मैं इंसाँ था ख़ुदा होने से पहले
विशाल खुल्लर
लम्हा लम्हा शोर सा बरपा हुआ अच्छा लगा
विशाल खुल्लर
क्या ख़ला आसमान था पहले
विशाल खुल्लर