Ghazal Poetry (page 67)
अल्लाह ऐ बुतो हमें दिखलाए लखनऊ
वाजिद अली शाह अख़्तर
ऐ नसीम-ए-सहरी हम तो हवा होते हैं
वाजिद अली शाह अख़्तर
क़स्में वा'दे रह जाते हैं
वजीह सानी
मोहब्बत के तआ'क़ुब में थकन से चूर होने तक
वजीह सानी
मिरे अंदर कहीं पर खो गई है
वजीह सानी
क्या बताएँ उस के बिन कैसे ज़िंदगी कर ली
वजीह सानी
होंट मसरूफ़-ए-दुआ आँख सवाली क्यूँ है
वजीह सानी
गिले शिकवे के दफ़्तर आ गए तुम
वजीह सानी
इक मोहब्बत का फ़ुसूँ था सो अभी बाक़ी है
वजीह सानी
दम-ए-विसाल ये हसरत रही रही न रही
वजीह सानी
अपने अंदाज़ में औरों से जुदा लगते हो
वजीह सानी
अच्छा हुआ कि इश्क़ में बर्बाद हो गए
वजीह सानी
साए ने साए को सदा दी
वजद चुगताई
रात क़ातिल की गली हो जैसे
वजद चुगताई
ना-मुरादी ही लिखी थी सो वो पूरी हो गई
वजद चुगताई
लगाएँ आग ही दिल में कि कुछ उजाला हो
वजद चुगताई
कौन ये रौशनी को समझाए
वजद चुगताई
फ़ज़ा में दाएरे बिखरे हुए हैं
वजद चुगताई
दुनिया अपनी मंज़िल पहुँची तुम घर में बेज़ार पड़े
वजद चुगताई
देखने में ये काँच का घर है
वजद चुगताई
चाहतों की जो दिल को आदत है
वजद चुगताई
आप ही अपना मैं दुश्मन हो गया
वजद चुगताई
ज़मीं रोई हमारे हाल पर और आसमाँ रोया
वहशत रज़ा अली कलकत्वी
ज़ब्त की कोशिश है जान-ए-ना-तवाँ मुश्किल में है
वहशत रज़ा अली कलकत्वी
यही है इश्क़ की मुश्किल तो मुश्किल आसाँ है
वहशत रज़ा अली कलकत्वी
यहाँ हर आने वाला बन के इबरत का निशाँ आया
वहशत रज़ा अली कलकत्वी
'वहशत'-ए-मुब्तला ख़ुदा के लिए
वहशत रज़ा अली कलकत्वी
वफ़ा-ए-दोस्ताँ कैसी जफ़ा-ए-दुश्मनाँ कैसी
वहशत रज़ा अली कलकत्वी
तू है और ऐश है और अंजुमन-आराई है
वहशत रज़ा अली कलकत्वी
तीर-ए-नज़र ने ज़ुल्म को एहसाँ बना दिया
वहशत रज़ा अली कलकत्वी