Ghazal Poetry (page 65)

तुझ से बिछड़ के यूँ तो बहुत जी उदास है

वाली आसी

सुनो ये ग़म की सियह रात जाने वाली है

वाली आसी

फूल से मासूम बच्चों की ज़बाँ हो जाएँगे

वाली आसी

फूल से मासूम बच्चों की ज़बाँ हो जाएँगे

वाली आसी

फिर वही रेग-ए-बयाबाँ का है मंज़र और हम

वाली आसी

मिल भी जाते हैं तो कतरा के निकल जाते हैं

वाली आसी

मैं जब छोटा सा था काग़ज़ पे ये मंज़र बनाता था

वाली आसी

क्या हिज्र में जी निढाल करना

वाली आसी

कुछ दिन तिरा ख़याल तिरी आरज़ू रही

वाली आसी

जिन की यादें हैं अभी दिल में निशानी की तरह

वाली आसी

जी का जंजाल है इश्क़ मियाँ क़िस्सा ये तमाम करो 'वाली'

वाली आसी

इश्क़ की राह में यूँ हद से गुज़र मत जाना

वाली आसी

हम जो दिन-रात ये इत्र-ए-दिल-ओ-जाँ खींचते हैं

वाली आसी

हम अपने-आप पे भी ज़ाहिर कभी दिल का हाल नहीं करते

वाली आसी

दिन भर ग़मों की धूप में चलना पड़ा मुझे

वाली आसी

छतरी लगा के घर से निकलने लगे हैं हम

वाली आसी

भूले-बिसरे हुए ग़म याद बहुत करता है

वाली आसी

ब-रंग-ए-नग़मा बिखर जाना चाहते हैं हम

वाली आसी

बहुत दिन से कोई मंज़र बनाना चाहते हैं हम

वाली आसी

आरज़ू ले के कोई घर से निकलते क्यूँ हो

वाली आसी

आज तक जो भी हुआ उस को भुला देना है

वाली आसी

यूँ तो तन्हाई में घबराए बहुत

वकील अख़्तर

वो जो वीरान फिरा करता है

वकील अख़्तर

जहालत का मंज़र जो राहों में था

वकील अख़्तर

अब नींद कहाँ आँखों में शोला सा भरा है

वकील अख़्तर

ज़िंदगी दस्त-ए-तह-ए-संग रही है बरसों

वकील अख़्तर

मैं नाम-लेवा हूँ तेरा तू मो'तबर कर दे

वकील अख़्तर

किवाड़ बंद भी है और नीम-वा भी है

वकील अख़्तर

बुझा भी जाए कोई आ के आँधियों की तरह

वकील अख़्तर

अपनी ना-कर्दा-गुनाही की सज़ा हो जैसे

वकील अख़्तर