Ghazal Poetry (page 64)
मुश्ताक़ हैं उश्शाक़ तिरी बाँकी अदा के
वली मोहम्मद वली
मुफ़्लिसी सब बहार खोती है
वली मोहम्मद वली
मत ग़ुस्से के शो'ले सूँ जलते कूँ जलाती जा
वली मोहम्मद वली
मैं आशिक़ी में तब सूँ अफ़्साना हो रहा हूँ
वली मोहम्मद वली
किया मुझ इश्क़ ने ज़ालिम कूँ आब आहिस्ता आहिस्ता
वली मोहम्मद वली
ख़ूब-रू ख़ूब काम करते हैं
वली मोहम्मद वली
कमर उस दिलरुबा की दिलरुबा है
वली मोहम्मद वली
जिसे इश्क़ का तीर कारी लगे
वली मोहम्मद वली
जिस दिलरुबा सूँ दिल कूँ मिरे इत्तिहाद है
वली मोहम्मद वली
जब तुझ अरक़ के वस्फ़ में जारी क़लम हुआ
वली मोहम्मद वली
जब सनम कूँ ख़याल-ए-बाग़ हुआ
वली मोहम्मद वली
इश्क़ में सब्र-ओ-रज़ा दरकार है
वली मोहम्मद वली
इश्क़ बेताब-ए-जाँ-गुदाज़ी है
वली मोहम्मद वली
हुए हैं राम पीतम के नयन आहिस्ता-आहिस्ता
वली मोहम्मद वली
हुआ ज़ाहिर ख़त-ए-रू-ए-निगार आहिस्ता-आहिस्ता
वली मोहम्मद वली
दिल तलबगार-ए-नाज़-ए-मह-वश है
वली मोहम्मद वली
दिल कूँ तुझ बाज बे-क़रारी है
वली मोहम्मद वली
दिल हुआ है मिरा ख़राब-ए-सुख़न
वली मोहम्मद वली
देखना हर सुब्ह तुझ रुख़्सार का
वली मोहम्मद वली
छुपा हूँ मैं सदा-ए-बाँसुली में
वली मोहम्मद वली
भड़के है दिल की आतिश तुझ नेह की हवा सूँ
वली मोहम्मद वली
अगर गुलशन तरफ़ वो नौ-ख़त-ए-रंगीं-अदा निकले
वली मोहम्मद वली
आशिक़ के मुख पे नैन के पानी को देख तूँ
वली मोहम्मद वली
आज सरसब्ज़ कोह ओ सहरा है
वली मोहम्मद वली
आज दिस्ता है हाल कुछ का कुछ
वली मोहम्मद वली
यूँ भी जीने के बहाने निकले
वली आलम शाहीन
सफ़र है ख़त्म मगर बे-घरी न जाएगी
वली आलम शाहीन
हुस्न पर बोझ हुए उस के ही वा'दे अब तो
वली आलम शाहीन
यूँ तो हँसते हुए लड़कों को भी ग़म होता है
वाली आसी
वो सूरतें जो बड़ी शोख़ हैं सजीली हैं
वाली आसी