Ghazal Poetry (page 62)

फूँक दे है मुँह तिरा हर साफ़-दिल के तन में आग

वली उज़लत

फिर आई फ़स्ल-ए-गुल ऐ यार देखिए क्या हो

वली उज़लत

नयन में ख़ूँ भर आया दिल में ख़ार-ए-ग़म छुपा शायद

वली उज़लत

नंग नहीं मुझ को तड़पने से सँभल जाने का

वली उज़लत

न शोख़ियों से करे हैं वो चश्म-ए-गुल-गूँ रक़्स

वली उज़लत

मुझ क़ब्र से यार क्यूँके जावे

वली उज़लत

मिरे नज़'अ को मत उस से कहो हुआ सो हुआ

वली उज़लत

मेरे अश्कों की गई थी रेल वीराने पे क्या गुज़रा

वली उज़लत

मौसम-ए-गुल में हैं दीवानों के बाज़ार कई

वली उज़लत

मैं वो मजनूँ हूँ कि आबाद न उजड़ा समझूँ

वली उज़लत

माह-ए-कामिल हो मुक़ाबिल यार के रू से चे-ख़ुश

वली उज़लत

मग़्ज़-ए-बहार इस बरस उस बिन बचा न था

वली उज़लत

कुफ़्र मोमिन है न करना दिलबराँ से इख़्तिलात

वली उज़लत

ख़ुनुक-जोशी न करते जूँ सबा गर ये बुताँ हम से

वली उज़लत

ख़ुदा शाहिद बुतो दो-जग से ये सौदा है निर्वाला

वली उज़लत

ख़ुदा किसी कूँ किसी साथ आश्ना न करे

वली उज़लत

ख़ुदा ही पहुँचे फ़रियादों को हम से बे-नसीबों के

वली उज़लत

ख़त ने आ कर की है शायद रहम फ़रमाने की अर्ज़

वली उज़लत

कर रहे हैं मुझ से तुझ-बिन दीदा-ए-नमनाक जंग

वली उज़लत

जुनूँ-आवर शब-ए-महताब थी पी की तमन्ना में

वली उज़लत

जूँ गुल अज़-बस-कि जुनूँ है मिरा सामान के सात

वली उज़लत

जो आशिक़ हो उसे सहरा में चल जाने से क्या निस्बत

वली उज़लत

जिन दिनों हम उस शब-ए-हज़ के सियह-कारों में थे

वली उज़लत

जाती रहीं किधर वो मोहब्बत की बानियाँ

वली उज़लत

जपे है विर्द सा तुझ से सनम के नाम को शैख़

वली उज़लत

जब तन न रहा मेरा हूँ वासिल-ए-जानाना

वली उज़लत

जब से दिलबर ने आँख फेरा है

वली उज़लत

हुए हम जब से पैदा अपने दीवाने हुए होते

वली उज़लत

हँसूँ जूँ गुल तिरे ज़ख़्मों से उल्फ़त इस को कहते हैं

वली उज़लत

है उस की ज़ुल्फ़ से नित पंजा-ए-अदू गुस्ताख़

वली उज़लत