Ghazal Poetry (page 61)
जो मरीज़ इश्क़ के हैं उन को शिफ़ा है कि नहीं
वलीउल्लाह मुहिब
जिसे गर्म-इख़्तिलाती की लगा दे दिल में तू आतिश
वलीउल्लाह मुहिब
जी चाहे का'बे जाओ जी चाहे बुत को पूजो
वलीउल्लाह मुहिब
हो जिस क़दर कि तुझ से ऐ पुर-जफ़ा जफ़ा कर
वलीउल्लाह मुहिब
हर आन यास बढ़नी हर दम उमीद घटनी
वलीउल्लाह मुहिब
हमारी चाह साहब जानते हैं
वलीउल्लाह मुहिब
है मिरे पहलू में और मुझ को नज़र आता नहीं
वलीउल्लाह मुहिब
ग़म-ए-जाँ तू है अगर राहत-ए-जाँ है तू है
वलीउल्लाह मुहिब
दुनिया में क्या किसी से सरोकार है हमें
वलीउल्लाह मुहिब
दिल-ए-ख़िल्क़त-ए-ख़ुदा को सनमा जला न चंदाँ
वलीउल्लाह मुहिब
दिला ये मय-कदा-ए-इश्क़ है शराब तू पी
वलीउल्लाह मुहिब
देखता कुछ हूँ ध्यान में कुछ है
वलीउल्लाह मुहिब
देखा जो कुछ जहाँ में कोई दम ये सब नहीं
वलीउल्लाह मुहिब
बुलबुल वो गुल है ख़्वाब में तू गा के मत जगा
वलीउल्लाह मुहिब
बुलबुल बजाए अपने तुझे हम-नवा से बहस
वलीउल्लाह मुहिब
ब-तस्ख़ीर-बुताँ तस्बीह क्यूँ ज़ाहिद फिराते हैं
वलीउल्लाह मुहिब
अश्क-बारी का मिरी आँखों ने ये बाँधा है झाड़
वलीउल्लाह मुहिब
ऐ हम-नफ़स उस ज़ुल्फ़ के अफ़्साने को मत छेड़
वलीउल्लाह मुहिब
ऐ हम-दमाँ भुलाओ न तुम याद-ए-रफ़्तगाँ
वलीउल्लाह मुहिब
ऐ दिल आता है चमन में वो शराबी तू पहुँच
वलीउल्लाह मुहिब
आना है तो आ जाओ यक आन मिरा साहब
वलीउल्लाह मुहिब
यार उठ गए दुनिया से अग़्यार की बारी है
वली उज़लत
वो क्या दिन थे जो क़ातिल-बिन दिल-ए-रंजूर रो देता
वली उज़लत
वक़्त बोसे के मिरा मुँह उस के लब से जूँ जुड़ा
वली उज़लत
तुझ से बोसा मैं न माँगा कभू डरते डरते
वली उज़लत
तुझ क़बा पर गुलाब का बूटा
वली उज़लत
तीरा-बख़्तों को करे है नाला-ए-ग़मगीं ख़राब
वली उज़लत
तीरा-बख़्तों को करे है नाला-ए-ग़मगीं ख़राब
वली उज़लत
तिरे लब-बिन है दिल में शोला-ज़न मुल जिस को कहते हैं
वली उज़लत
शिताब खो गई पीरी जवानी दो दिन की
वली उज़लत