Ghazal Poetry (page 59)
रात के समुंदर में ग़म की नाव चलती है
वामिक़ जौनपुरी
क़िर्तास पे नक़्शे हमें क्या क्या नज़र आए
वामिक़ जौनपुरी
नए गुल खिले नए दिल बने नए नक़्श कितने उभर गए
वामिक़ जौनपुरी
मिरे फ़िक्र ओ फ़न को नई फ़ज़ा नए बाल-ओ-पर की तलाश है
वामिक़ जौनपुरी
ख़लिश सुकूँ का मुदावा नहीं तो कुछ भी नहीं
वामिक़ जौनपुरी
कहीं साक़ी का फ़ैज़-ए-आम भी है
वामिक़ जौनपुरी
जो दश्त ख़्वाबों में अक्सर दिखाई देता है
वामिक़ जौनपुरी
जीने का लुत्फ़ कुछ तो उठाओ नशे में आओ
वामिक़ जौनपुरी
इस तरह से कश्ती भी कोई पार लगे है
वामिक़ जौनपुरी
हुज़ूर-ए-यार भी आज़ुर्दगी नहीं जाती
वामिक़ जौनपुरी
हो रही है दर-ब-दर ऐसी जबीं-साई कि बस
वामिक़ जौनपुरी
हमारे मय-कदे का अब निज़ाम बदलेगा
वामिक़ जौनपुरी
हालात से फ़रार की क्या जुस्तुजू करें
वामिक़ जौनपुरी
फ़नकार के काम आई न कुछ दीदा-वरी भी
वामिक़ जौनपुरी
दीवाने दीवाने ठहरे खेल गए अँगारों से
वामिक़ जौनपुरी
दिल तोड़ कर वो दिल में पशीमाँ हुआ तो क्या
वामिक़ जौनपुरी
दिल परेशाँ है न जाने किस लिए
वामिक़ जौनपुरी
दिल के वीराने को यूँ आबाद कर लेते हैं हम
वामिक़ जौनपुरी
दिल अज़ल से मरकज़-ए-आलाम है
वामिक़ जौनपुरी
बुलाए जाते हैं मक़्तल में हम सज़ा के लिए
वामिक़ जौनपुरी
बर्क़ सर-ए-शाख़-सार देखिए कब तक रहे
वामिक़ जौनपुरी
अपना एजाज़ दिखा दे साक़ी
वामिक़ जौनपुरी
अभी तो हौसला-ए-कारोबार बाक़ी है
वामिक़ जौनपुरी
वक़्त-ए-रुख़्सत शबनमी सौग़ात की बातें करो
वलीउल्लाह वली
क्या कहूँ कि क्या हूँ मैं
वलीउल्लाह वली
कोई अपने वास्ते महशर उठा कर ले गया
वलीउल्लाह वली
कल तलक जो था तसव्वुर अंजुमन-आराइयों का
वलीउल्लाह वली
कभी जब दास्तान-ए-गर्दिश-ए-अय्याम लिखता हूँ
वलीउल्लाह वली
है क़ानून-ए-फ़ितरत कोई क्या करेगा
वलीउल्लाह वली
बे-नियाज़ नग़्मा-ए-दुनिया हूँ मैं
वलीउल्लाह वली