Ghazal Poetry (page 60)
आप की नज़रों में शायद इस लिए अच्छा हूँ मैं
वलीउल्लाह वली
ख़याल दिल को है उस गुल से आश्नाई का
वलीउल्लाह सरहिंदी इशतियाक़
यूँ घर से मोहब्बत के क्या भाग चले जाना
वलीउल्लाह मुहिब
वाँ जो कुछ का'बे में असरार है अल्लाह अल्लाह
वलीउल्लाह मुहिब
वहीं जी उठते हैं मुर्दे ये क्या ठोकर से छूना है
वलीउल्लाह मुहिब
उस बुत ने गुलाबी जो उठा मुँह से लगाई
वलीउल्लाह मुहिब
उधर वो बे-मुरव्वत बेवफ़ा बे-रहम क़ातिल है
वलीउल्लाह मुहिब
तुम जानते हो किस लिए वो मुझ से गया लड़
वलीउल्लाह मुहिब
तरवार खींच हम को दिखाते हो जब न तब
वलीउल्लाह मुहिब
शोरिश से चश्म-ए-तर की ज़ि-बस ग़र्क़-ए-आब हूँ
वलीउल्लाह मुहिब
शब-ए-फ़िराक़ न काटे कटे है क्या कीजे
वलीउल्लाह मुहिब
शब न ये सर्दी से यख़-बस्ता ज़मीं हर तर्फ़ है
वलीउल्लाह मुहिब
साथ ग़ैरों के है सदा गट-पट
वलीउल्लाह मुहिब
सनम ने जब लब-ए-गौहर-फ़शान खोल दिए
वलीउल्लाह मुहिब
राएगाँ औक़ात खो कर हैफ़ खाना है अबस
वलीउल्लाह मुहिब
पहले सफ़-ए-उश्शाक़ में मेरा ही लहू चाट
वलीउल्लाह मुहिब
पहचाने तू हर-दम वही हर आन वही है
वलीउल्लाह मुहिब
नहीं दुनिया में सिवा ख़ार-ओ-ख़स-ए-कूचा-ए-दोस्त
वलीउल्लाह मुहिब
मोहब्बत से तरीक़-ए-दोस्ती से चाह से माँगो
वलीउल्लाह मुहिब
मिलती है उसे गौहर-ए-शब-ताब की मीरास
वलीउल्लाह मुहिब
मिल उस परी से क्या क्या हुआ दिल
वलीउल्लाह मुहिब
मेरी ख़बर न लेना ऐ यार है तअ'ज्जुब
वलीउल्लाह मुहिब
मिरे दिल में हिज्र के बाब हैं तुझे अब तलक वही नाज़ है
वलीउल्लाह मुहिब
मा'रके में इश्क़ के सर से गुज़रने से न डर
वलीउल्लाह मुहिब
मैं जीते-जी तलक रहूँ मरहून आप का
वलीउल्लाह मुहिब
मय-ए-गुल-गूँ के जो शीशे में परी रहती है
वलीउल्लाह मुहिब
लाला-रू तुम ग़ैर के पाले पड़े
वलीउल्लाह मुहिब
किया बाग़-ए-जहाँ में नाम उन का सर्व कह कह कर
वलीउल्लाह मुहिब
ख़ाना-ए-दिल का जो तवाइफ़ है
वलीउल्लाह मुहिब
काफ़िर हुए सनम हम दीं-दार तेरी ख़ातिर
वलीउल्लाह मुहिब