Ghazal Poetry (page 58)

मज़ा था हम को जो बुलबुल से दू-बदू करते

वक़ार हिल्म सय्यद नगलवी

लगता है इन दिनों के है महशर-ब-कफ़ हवा

वक़ार हिल्म सय्यद नगलवी

कुएँ जो पानी की बिन प्यास चाह रखते हैं

वक़ार हिल्म सय्यद नगलवी

इक-बटा-दो को करूँ क्यूँ न रक़म दो-बटा-चार

वक़ार हिल्म सय्यद नगलवी

गर्द है ज़र है सीम है ज़र्रा

वक़ार हिल्म सय्यद नगलवी

चश्म-ए-तर है सहाब है क्या है

वक़ार हिल्म सय्यद नगलवी

मौसम को भी 'वक़ार' बदल जाना चाहिए

वक़ार फ़ातमी

जो सोचते रहे वो कर गुज़रना चाहते हैं

वक़ार फ़ातमी

बरसों बा'द मिला तो उस ने हम से पूछा कैसे हो

वक़ार फ़ातमी

वो निगाह मिल के निगाह से ब-अदा-ए-ख़ास झिझक गई

वक़ार बिजनोरी

उन की चश्म-ए-मस्त में पोशीदा इक मय-ख़ाना था

वक़ार बिजनोरी

तुम ख़फ़ा क्या हुए हयात गई

वक़ार बिजनोरी

रह-ए-कहकशाँ से गुज़र गया हमा-ईन-ओ-आँ से गुज़र गया

वक़ार बिजनोरी

नज़र मिलते ही बरसे अश्क-ए-ख़ूँ क्यूँ दीदा-ए-तर से

वक़ार बिजनोरी

मस्त नज़रों का इल्तिफ़ात न पूछ

वक़ार बिजनोरी

इश्क़ में ख़ुद-सरी नहीं होती

वक़ार बिजनोरी

ग़म-ए-मोहब्बत है कार-फ़रमा दुआ से पहले असर से पहले

वक़ार बिजनोरी

एक इशारे में बदल जाता है मयख़ाने का नाम

वक़ार बिजनोरी

चश्म-ए-यक़ीं से देखिए जल्वा-गह-ए-सिफ़ात में

वक़ार बिजनोरी

ज़हराब पीने वाले अमर हो के रह गए

वामिक़ जौनपुरी

ज़बाँ तक जो न आए वो मोहब्बत और होती है

वामिक़ जौनपुरी

वो तन्हा मेरे ही दरपय नहीं है

वामिक़ जौनपुरी

उम्र की रौ बदल गई शायद

वामिक़ जौनपुरी

तुझ से मिल कर दिल में रह जाती है अरमानों की बात

वामिक़ जौनपुरी

तक़्सीर क्या है हसरत-ए-दीदार ही तो है

वामिक़ जौनपुरी

सुर्ख़ दामन में शफ़क़ के कोई तारा तो नहीं

वामिक़ जौनपुरी

शीशा उस का अजीब है ख़ुद ही

वामिक़ जौनपुरी

शमएँ रौशन हैं आबगीनों में

वामिक़ जौनपुरी

साज़-ए-हस्ती में कुछ सदा ही नहीं

वामिक़ जौनपुरी

रहना तुम चाहे जहाँ ख़बरों में आते रहना

वामिक़ जौनपुरी