Ghazal Poetry (page 56)

कहाँ क़तरे की ग़म-ख़्वारी करे है

वसीम बरेलवी

जहाँ दरिया कहीं अपने किनारे छोड़ देता है

वसीम बरेलवी

हम अपने आप को इक मसअला बना न सके

वसीम बरेलवी

हवेलियों में मिरी तर्बियत नहीं होती

वसीम बरेलवी

हमारा अज़्म-ए-सफ़र कब किधर का हो जाए

वसीम बरेलवी

हादसों की ज़द पे हैं तो मुस्कुराना छोड़ दें

वसीम बरेलवी

दूर से ही बस दरिया दरिया लगता है

वसीम बरेलवी

दुख अपना अगर हम को बताना नहीं आता

वसीम बरेलवी

दुआ करो कि कोई प्यास नज़्र-ए-जाम न हो

वसीम बरेलवी

चाँद का ख़्वाब उजालों की नज़र लगता है

वसीम बरेलवी

चलो हम ही पहल कर दें कि हम से बद-गुमाँ क्यूँ हो

वसीम बरेलवी

भला ग़मों से कहाँ हार जाने वाले थे

वसीम बरेलवी

अपने साए को इतना समझाने दे

वसीम बरेलवी

अपने हर हर लफ़्ज़ का ख़ुद आईना हो जाऊँगा

वसीम बरेलवी

अपने चेहरे से जो ज़ाहिर है छुपाएँ कैसे

वसीम बरेलवी

अपने अंदाज़ का अकेला था

वसीम बरेलवी

अंधेरा ज़ेहन का सम्त-ए-सफ़र जब खोने लगता है

वसीम बरेलवी

आते आते मिरा नाम सा रह गया

वसीम बरेलवी

मुझ को दुनिया से बे-ख़बर कर दे

वसीम अकरम

जब से मैं ने इश्क़ का पैराहन पहना है

वसीम अकरम

इक अधूरी सी शाम बाक़ी है

वसीम अकरम

आज जिस पर ये पर्दा-दारी है

वसीम अकरम

लहू लहू सा दिल-ए-दाग़-दार ले के चले

वाक़िफ़ राय बरेलवी

खेल मौजों का ख़तरनाक सही क्या मैं इस खेल से डर जाऊँगा

वाक़िफ़ राय बरेलवी

बदले हुए हालात से मायूस न होना

वाक़िफ़ राय बरेलवी

रात भर तुम न जागते रहियो

वक़ास बलूच

तिरी नज़र में तिरे मा-सिवा नहीं होगा

वक़ार वासिक़ी

सदा-ए-आफ़रीं उट्ठी थी जस्त ऐसी थी

वक़ार वासिक़ी

किस क़दर वज़्न है ख़ताओं में

वक़ार वासिक़ी

ख़ुश-नज़र कह के टाल दे मुझ को

वक़ार वासिक़ी