Ghazal Poetry (page 54)
डर मौत का न ख़ौफ़ किसी देवता का था
वसीम मीनाई
मफ़रूर कभी ख़ुद पर शर्मिंदा नज़र आए
वसीम मलिक
जो शख़्स मिरा दस्त-ए-हुनर काट रहा है
वसीम मलिक
हम-सफ़र तू ने परों को जो मिरे काटा है
वसीम मलिक
ऐ भँवर तेरी तरह बेबाक हो जाएँगे हम
वसीम मलिक
वहाँ अब जा के देखें हम से क्या इरशाद करते हैं
वसीम ख़ैराबादी
शरीर तेरी तरह आँख भी तिरी होगी
वसीम ख़ैराबादी
क़तरे गिरे जो कुछ अरक़-ए-इंफ़िआ'ल के
वसीम ख़ैराबादी
फूल अपने वस्फ़ सुनते हैं उस ख़ुश-नसीब से
वसीम ख़ैराबादी
पत्थर नज़र थी वाइ'ज़-ए-ख़ाना-ख़राब की
वसीम ख़ैराबादी
नज़्अ' में प्यार से क्यूँ पूछते हो तुम मुझ को
वसीम ख़ैराबादी
मौत आई मुझे कूचे में तिरे जाने से
वसीम ख़ैराबादी
क्या हुआ उस ने जो आशिक़ से जफ़ाकारी की
वसीम ख़ैराबादी
कम सितम करने में क़ातिल से नहीं दिल मेरा
वसीम ख़ैराबादी
जाए आशिक़ की बला हश्र में क्या रक्खा है
वसीम ख़ैराबादी
हम ने उस शोख़ की रानाई क़ामत देखी
वसीम ख़ैराबादी
भर दीं शबाब ने ये उन आँखों में शोख़ियाँ
वसीम ख़ैराबादी
ज़िंदगी तुझ पे अब इल्ज़ाम कोई क्या रक्खे
वसीम बरेलवी
ज़रा सा क़तरा कहीं आज अगर उभरता है
वसीम बरेलवी
ये है तो सब के लिए हो ये ज़िद हमारी है
वसीम बरेलवी
यही बज़्म-ए-ऐश होगी यही दौर-ए-जाम होगा
वसीम बरेलवी
वो मुझ को क्या बताना चाहता है
वसीम बरेलवी
वो मेरे घर नहीं आता मैं उस के घर नहीं जाता
वसीम बरेलवी
वो मेरे बालों में यूँ उँगलियाँ फिराता था
वसीम बरेलवी
उस ने मेरी राह न देखी और वो रिश्ता तोड़ लिया
वसीम बरेलवी
उसे समझने का कोई तो रास्ता निकले
वसीम बरेलवी
उदासियों में भी रस्ते निकाल लेता है
वसीम बरेलवी
तुम्हें ग़मों का समझना अगर न आएगा
वसीम बरेलवी
तुम्हारी राह में मिट्टी के घर नहीं आते
वसीम बरेलवी
तुझ को सोचा तो पता हो गया रुस्वाई को
वसीम बरेलवी