Ghazal Poetry (page 53)
वो जिस की जुस्तुजू-ए-दीद में पथरा गईं आँखें
वासिफ़ देहलवी
वो जिन की लौ से हज़ारों चराग़ जलते थे
वासिफ़ देहलवी
वो जल्वा तूर पर जो दिखाया न जा सका
वासिफ़ देहलवी
तिरी उल्फ़त में जितनी मेरी ज़िल्लत बढ़ती जाती है
वासिफ़ देहलवी
क़दम यूँ बे-ख़तर हो कर न मय-ख़ाने में रख देना
वासिफ़ देहलवी
नसीम-ए-सुब्ह यूँ ले कर तिरा पैग़ाम आती है
वासिफ़ देहलवी
नहीं मालूम कितने हो चुके हैं इम्तिहाँ अब तक
वासिफ़ देहलवी
किसी के इश्क़ का ये मुस्तक़िल आज़ार क्या कहना
वासिफ़ देहलवी
खुलने ही लगे उन पर असरार-ए-शबाब आख़िर
वासिफ़ देहलवी
कहते हैं सर-ए-राह मुनासिब नहीं मिलना
वासिफ़ देहलवी
कभी दर्द-आश्ना तेरा भी क़ल्ब शादमाँ होगा
वासिफ़ देहलवी
इज़्ज़त उन्हें मिली वही आख़िर बड़े रहे
वासिफ़ देहलवी
हरीम-ए-नाज़ को हम ग़ैर की महफ़िल नहीं कहते
वासिफ़ देहलवी
हम-सफ़र थम तो सही दिल को सँभालूँ तो चलूँ
वासिफ़ देहलवी
बुझते हुए चराग़ फ़रोज़ाँ करेंगे हम
वासिफ़ देहलवी
बयाँ ऐ हम-नशीं ग़म की हिकायत और हो जाती
वासिफ़ देहलवी
अगर ख़ू-ए-तहम्मुल हो तो कोई ग़म नहीं होता
वासिफ़ देहलवी
उदास रातों में तेज़ कॉफ़ी की तल्ख़ियों में
वसी शाह
तुम मिरी आँख के तेवर न भुला पाओगे
वसी शाह
तो मैं भी ख़ुश हूँ कोई उस से जा के कह देना
वसी शाह
समुंदर में उतरता हूँ तो आँखें भीग जाती हैं
वसी शाह
कितनी ज़ुल्फ़ें उड़ीं कितने आँचल उड़े चाँद को क्या ख़बर
वसी शाह
कैसा मफ़्तूह सा मंज़र है कई सदियों से
वसी शाह
दुख दर्द में हमेशा निकाले तुम्हारे ख़त
वसी शाह
आँखों में चुभ गईं तिरी यादों की किर्चियाँ
वसी शाह
उस की तस्वीर क्या लगी हुई है
वसीम ताशिफ़
सो जाऊँ पर कैसे सोया जा सकता है
वसीम ताशिफ़
बाज़ औक़ात फ़राग़त में इक ऐसा लम्हा आता है
वसीम ताशिफ़
ये जल जाते हैं लब तक आह भी आने नहीं देते
वसीम मीनाई
जाने क्यूँ भाई का भाई खुल के दुश्मन हो गया
वसीम मीनाई