Ghazal Poetry (page 52)
उम्र की इस नाव का चलना भी क्या रुकना भी क्या
वज़ीर आग़ा
उड़ी जो गर्द तो इस ख़ाक-दाँ को पहचाना
वज़ीर आग़ा
तुम्हें ख़बर भी न मिली और हम शिकस्ता-हाल
वज़ीर आग़ा
थी नींद मेरी मगर उस में ख़्वाब उस का था
वज़ीर आग़ा
तिरा ही रूप नज़र आए जा-ब-जा मुझ को
वज़ीर आग़ा
सुनो उजड़ा मकाँ इक बद-दुआ है
वज़ीर आग़ा
सितारा तो कभी का जल-बुझा है
वज़ीर आग़ा
सिखा दिया है ज़माने ने बे-बसर रहना
वज़ीर आग़ा
सहर ने आ कर मुझे सुलाया तो मैं ने जाना
वज़ीर आग़ा
सफ़ेद फूल मिले शाख़-ए-सीम-बर के मुझे
वज़ीर आग़ा
रंग और रूप से जो बाला है
वज़ीर आग़ा
न आँखें ही झपकता है न कोई बात करता है
वज़ीर आग़ा
मंज़र था राख और तबीअत उदास थी
वज़ीर आग़ा
लाज़िम कहाँ कि सारा जहाँ ख़ुश-लिबास हो
वज़ीर आग़ा
किस किस से न वो लिपट रहा था
वज़ीर आग़ा
ख़ुद से हुआ जुदा तो मिला मर्तबा तुझे
वज़ीर आग़ा
जबीं-ए-संग पे लिक्खा मिरा फ़साना गया
वज़ीर आग़ा
इस गिर्या-ए-पैहम की अज़िय्यत से बचा दे
वज़ीर आग़ा
गुल ने ख़ुशबू को तज दिया न रहा
वज़ीर आग़ा
दिन ढल चुका था और परिंदा सफ़र में था
वज़ीर आग़ा
धूप के साथ गया साथ निभाने वाला
वज़ीर आग़ा
धार सी ताज़ा लहू की शबनम-अफ़्शानी में है
वज़ीर आग़ा
चलो माना हमीं बे-कारवाँ हैं
वज़ीर आग़ा
बे-ज़बाँ कलियों का दिल मैला किया
वज़ीर आग़ा
बे-सदा दम-ब-ख़ुद फ़ज़ा से डर
वज़ीर आग़ा
बादल छटे तो रात का हर ज़ख़्म वा हुआ
वज़ीर आग़ा
बादल बरस के खुल गया रुत मेहरबाँ हुई
वज़ीर आग़ा
आसमाँ पर अब्र-पारे का सफ़र मेरे लिए
वज़ीर आग़ा
कितने भी ग़म-ज़दा हों मगर मुस्कुराएँगे
वासिफ़ यार
ज़र्रा हरीफ़-ए-मेहर दरख़्शाँ है आज कल
वासिफ़ देहलवी