Ghazal Poetry (page 57)

जिस बात को सुन कर तुझे तकलीफ़ हुई है

वक़ार वासिक़ी

ग़ैर-मुमकिन था ये इक काम मगर हम ने किया

वक़ार वासिक़ी

अपने अंदर उतर रहा हूँ मैं

वक़ार वासिक़ी

पेश वो हर पल है साहब

वक़ार सहर

नक़ीब-ए-बख़्त सारे सो चुके हैं

वक़ार सहर

लबों पे शिकवा-ए-अय्याम भी नहीं होता

वक़ार सहर

इस बहाने के बा'द कैसा इश्क़

वक़ार सहर

सलीक़ा बोलने का हो तो बोलो

वक़ार मानवी

मिरे वजूद को पामाल करना चाहता है

वक़ार मानवी

ख़ुशी दामन-कशाँ है दिल असीर-ए-ग़म है बरसों से

वक़ार मानवी

जान नहीं पहचान नहीं है

वक़ार मानवी

गई है शाम अभी ज़ख़्म ज़ख़्म कर के मुझे

वक़ार मानवी

अगर रोना ही अब मेरा मुक़द्दर है मोहब्बत में

वक़ार मानवी

ज़ियादा सोचने वाले तुझे पता नहीं है

वक़ार ख़ान

ज़ख़्म खाते हैं जी जलाते हैं

वक़ार ख़ान

ये मानता हूँ कि सौ बार झूट कहता है

वक़ार ख़ान

वो ज़िम्मेदारी कितनी ख़ुशी से निभाई थी

वक़ार ख़ान

वो मेरा यार है पर मेरी मानता नहीं है

वक़ार ख़ान

सिदरत-उल-वस्ल के साए का तलबगार हूँ मैं

वक़ार ख़ान

मेरे होंटों का अभी ज़हर तिरे जिस्म में है

वक़ार ख़ान

मन की मय हो तो पियाले नहीं देखे जाते

वक़ार ख़ान

ख़ता क़ुबूल नहीं है तो ख़ुद ख़ता कर देख

वक़ार ख़ान

कभी सिसकी कभी आवाज़ा सफ़र जारी है

वक़ार ख़ान

जो तुझे और मुझे एक कर सका नहीं

वक़ार ख़ान

जहाँ पे इल्म की कोई क़द्र और हवाला नहीं

वक़ार ख़ान

देख पगली न दल लगा मिरे साथ

वक़ार ख़ान

बे-मिस्ल-ओ-बे-हिसाब उजालों के बा'द भी

वक़ार ख़ान

ज़िंदगी इतनी बे-मज़ा क्यूँ है

वक़ार हिल्म सय्यद नगलवी

ज़हर के घूँट पी रहे हैं हम

वक़ार हिल्म सय्यद नगलवी

मुद्दआ' हासिल मिरा हो कर रहा

वक़ार हिल्म सय्यद नगलवी