Ghazal Poetry (page 63)

गुल रहे नहिं नाम को सरकश हैं ख़ाराँ अल-अयाज़

वली उज़लत

ग़ुंचा-ए-दिल मिरा खा कर गुल-ए-ख़ंदाँ मेरा

वली उज़लत

घर यार का हम से दूर पड़ा गई हम से राहत एक तरफ़

वली उज़लत

ग़ैर-ए-आह-ए-सर्द नहीं दाग़ों के जाने का इलाज

वली उज़लत

गर्द-बाद अफ़्सोस का जंगल से है पैदा हनूज़

वली उज़लत

गर मेरे लहू रोने का बारान बनेगा

वली उज़लत

फ़स्ल-ए-गुल में नईं बघूले उठते वीरानों के बीच

वली उज़लत

दिलों में रहिए जहाँ के वले ख़ुदा के ढब

वली उज़लत

दर्द जूँ शम्अ' मिले है शब-ए-हिज्राँ मुझ को

वली उज़लत

बंदे हैं तेरी छब के मह से जमाल वाले

वली उज़लत

बहार आई जुनूँ लेगा हमारा इम्तिहाँ देखें

वली उज़लत

बहार आई ब-तंग आया दिल-ए-वहशत-पनाह अपना

वली उज़लत

बहार आधी गुज़र गई हाए हम क़ैदी हैं ज़िंदाँ के

वली उज़लत

असीरी बे-मज़ा लगती है बिन-सय्याद क्या कीजे

वली उज़लत

अरे उल्टे ज़माने मुझ पे क्या सीधा सितम लाया

वली उज़लत

ऐ यार मुझ अफ़सुर्दा-ए-हिज्राँ को पहुँच तू

वली उज़लत

ऐ नासेह चश्म-ए-तर से मत कर आँसू पाक रहने दे

वली उज़लत

अगर मैं मोजज़े को ख़ाकसारी के अयाँ करता

वली उज़लत

अबस तोड़ा मिरा दिल नाज़ सिखलाने के काम आता

वली उज़लत

आज दिल बे-क़रार है मेरा

वली उज़लत

तिरी नज़र का तीर जब जिगर के पार हो गया

वली शम्सी

याद करना हर घड़ी उस यार का

वली मोहम्मद वली

वो नाज़नीं अदा में एजाज़ है सरापा

वली मोहम्मद वली

तुझ लब की सिफ़त लाल-ए-बदख़्शाँ सूँ कहूँगा

वली मोहम्मद वली

तिरा मजनूँ हूँ सहरा की क़सम है

वली मोहम्मद वली

तिरा लब देख हैवाँ याद आवे

वली मोहम्मद वली

तख़्त जिस बे-ख़ानमाँ का दस्त-ए-वीरानी हुआ

वली मोहम्मद वली

सोहबत-ए-ग़ैर मूं जाया न करो

वली मोहम्मद वली

शग़्ल बेहतर है इश्क़-बाज़ी का

वली मोहम्मद वली

सजन टुक नाज़ सूँ मुझ पास आ आहिस्ता आहिस्ता

वली मोहम्मद वली