Ghazal Poetry (page 66)
सहराओं में भी कोई हमराज़ गुलों का है
वाजिद सहरी
प्यार के बंधन रिश्ते देखो
वाजिद सहरी
नादान होशियार बने जिन के रूप से
वाजिद सहरी
लहूलुहान समुंदर भी देखना है अभी
वाजिद क़ुरैशी
जो नहीं किया अब तक बे-हिसाब करना है
वाजिद क़ुरैशी
धुएँ की ओट से बाहर भी आ गया होता
वाजिद क़ुरैशी
मत समझना कि सिर्फ़ तू है यहाँ
वाजिद अमीर
बेचते क्या हो मियाँ आन के बाज़ार के बीच
वाजिद अमीर
ज़ोहरा सुहैल शम्स ख़ुर बद्र बहा तू कौन है
वाजिद अली शाह अख़्तर
याद में अपने यार-ए-जानी की
वाजिद अली शाह अख़्तर
उल्फ़त ने तिरी हम को तो रक्खा न कहीं का
वाजिद अली शाह अख़्तर
सुना है कूच तो उन का पर इस को क्या कहिए
वाजिद अली शाह अख़्तर
सुन रक्खो उसे दिल का लगाना नहीं अच्छा
वाजिद अली शाह अख़्तर
सहे ग़म पए रफ़्तगाँ कैसे कैसे
वाजिद अली शाह अख़्तर
पड़ा है पाँव में अब सिलसिला मोहब्बत का
वाजिद अली शाह अख़्तर
नायाब है सुकून दिल-ए-बे-क़रार में
वाजिद अली शाह अख़्तर
मोहब्बत से बंदा बना लीजिएगा
वाजिद अली शाह अख़्तर
लजयाई से नाज़ुक है ऐ जान बदन तेरा
वाजिद अली शाह अख़्तर
लबालब कर दे ऐ साक़ी है ख़ाली मेरा पैमाना
वाजिद अली शाह अख़्तर
कभी लुत्फ़-ए-ज़बान-ए-ख़ुश-बयाँ थे
वाजिद अली शाह अख़्तर
जा बैठते हो ग़ैरों में ग़ैरत नहीं आती
वाजिद अली शाह अख़्तर
इश्क़ से कुछ काम ने कुछ कू-ए-जानाँ से ग़रज़
वाजिद अली शाह अख़्तर
हाल-ए-दिल ऐ बुतो ख़ुदा जाने
वाजिद अली शाह अख़्तर
ग़ुंचा-ए-दिल खिले जो चाहो तुम
वाजिद अली शाह अख़्तर
गर्मियाँ शोख़ियाँ किस शान से हम देखते हैं
वाजिद अली शाह अख़्तर
दस्तार-ए-फ़क़ीराना इक ताज से अफ़्ज़ूँ है
वाजिद अली शाह अख़्तर
दिखाते हैं जो ये सनम देखते हैं
वाजिद अली शाह अख़्तर
चाक चाक अपना गरेबाँ न हुआ था सो हुआ
वाजिद अली शाह अख़्तर
बुतो ख़ुदा से डरो संग दिल सिवा न करो
वाजिद अली शाह अख़्तर
बरबाद न कर उस को ज़रा हाथ पे धर ला
वाजिद अली शाह अख़्तर