Ghazal Poetry (page 874)
मैं अपने दिल में नई ख़्वाहिशें सजाए हुए
अफ़ज़ल मिनहास
लोग हँसने के लिए रोते हैं अक्सर दहर में
अफ़ज़ल मिनहास
कर्ब के शहर से निकले तो ये मंज़र देखा
अफ़ज़ल मिनहास
काँच की ज़ंजीर टूटी तो सदा भी आएगी
अफ़ज़ल मिनहास
जो शख़्स भी मिला है वो इक ज़िंदा लाश है
अफ़ज़ल मिनहास
हर चंद ज़िंदगी का सफ़र मुश्किलों में है
अफ़ज़ल मिनहास
गुम-सुम हवा के पेड़ से लिपटा हुआ हूँ में
अफ़ज़ल मिनहास
गिर पड़ा तू आख़िरी ज़ीने को छू कर किस लिए
अफ़ज़ल मिनहास
गहरा सुकूत ज़ेहन को बेहाल कर गया
अफ़ज़ल मिनहास
एक पैकर यूँ चमक उट्ठा है मेरे ध्यान में
अफ़ज़ल मिनहास
चुप रहे तो शहर की हंगामा आराई मिली
अफ़ज़ल मिनहास
अपने माहौल से कुछ यूँ भी तो घबराए न थे
अफ़ज़ल मिनहास
अपने माहौल से कुछ यूँ भी तो घबराए न थे
अफ़ज़ल मिनहास
वो जो इक शख़्स वहाँ है वो यहाँ कैसे हो
अफ़ज़ल ख़ान
उस लम्हे तिश्ना-लब रेत भी पानी होती है
अफ़ज़ल ख़ान
तो फिर वो इश्क़ ये नक़्द-ओ-नज़र बराए-फ़रोख़्त
अफ़ज़ल ख़ान
तभी तो मैं मोहब्बत का हवालाती नहीं होता
अफ़ज़ल ख़ान
शिकस्त-ए-ज़िंदगी वैसे भी मौत ही है ना
अफ़ज़ल ख़ान
राह भोला हूँ मगर ये मिरी ख़ामी तो नहीं
अफ़ज़ल ख़ान
नहीं था ध्यान कोई तोड़ते हुए सिगरेट
अफ़ज़ल ख़ान
मुझे रोना नहीं आवाज़ भी भारी नहीं करनी
अफ़ज़ल ख़ान
कल अपने शहर की बस में सवार होते हुए
अफ़ज़ल ख़ान
जब इक सराब में प्यासों को प्यास उतारती है
अफ़ज़ल ख़ान
हमारे ख़ून के प्यासे पशेमानी से मर जाएँ
अफ़ज़ल ख़ान
आज ही फ़ुर्सत से कल का मसअला छेड़ूँगा मैं
अफ़ज़ल ख़ान
आदमी ख़्वार भी होता है नहीं भी होता
अफ़ज़ल ख़ान
ज़मीं से आगे भला जाना था कहाँ मैं ने
अफ़ज़ल गौहर राव
ये जो सूरज है ये सूरज भी कहाँ था पहले
अफ़ज़ल गौहर राव
तेरी दुनिया से ये दिल इस लिए घबराता है
अफ़ज़ल गौहर राव
शिकस्त खा के भी कब हौसले हैं कम मेरे
अफ़ज़ल गौहर राव