Ghazal Poetry (page 873)
आग लगा दी पहले गुलों ने बाग़ में वो शादाबी की
आग़ा हज्जू शरफ़
पेश आने लगे हैं नफ़रत से
अफ़ज़ल पेशावरी
नौजवानी में अजब दिल की लगी होती है
अफ़ज़ल पेशावरी
वक़्त के तूफ़ानी सागर में क्रोध कपट के रेले हैं
अफ़ज़ल परवेज़
मैं ने दिल-ए-बे-ताब पे जो जब्र किया है
अफ़ज़ल परवेज़
लैला सर-ब-गरेबाँ है मजनूँ सा आशिक़-ए-ज़ार कहाँ
अफ़ज़ल परवेज़
ख़ुश-क़िस्मत हैं वो जो गाँव में लम्बी तान के सोते हैं
अफ़ज़ल परवेज़
कारज़ार-ए-इश्क़-ओ-सर-मस्ती में नुसरत-याब हों
अफ़ज़ल परवेज़
जो दर्द-ए-दिल कहो आहिस्ता बोलो
अफ़ज़ल परवेज़
हुस्न हीरे की कनी हो जैसे
अफ़ज़ल परवेज़
गर्द उड़े या कोई आँधी ही चले
अफ़ज़ल परवेज़
सुबू उठाऊँ तो पीने के बीच खुलती है
अफ़ज़ाल नवेद
रह-ए-सुलूक में बल डालने पे रहता है
अफ़ज़ाल नवेद
पानी शजर पे फूल बना देखता रहा
अफ़ज़ाल नवेद
न रोना रह गया बाक़ी न हँसना रह गया बाक़ी
अफ़ज़ाल नवेद
मकान-ए-ख़्वाब में जंगल की बास रहने लगी
अफ़ज़ाल नवेद
ख़ाली हुआ गिलास नशा सर में आ गया
अफ़ज़ाल नवेद
जंग से जंगल बना जंगल से मैं निकला नहीं
अफ़ज़ाल नवेद
हम ने कुछ पँख जो दालान में रख छोड़े हैं
अफ़ज़ाल नवेद
एक उजली उमंग उड़ाई थी
अफ़ज़ाल नवेद
इक धन को एक धन से अलग कर लूँ और गाऊँ
अफ़ज़ाल नवेद
दिखाई दे कि शुआ-ए-बसीर खींचता हूँ
अफ़ज़ाल नवेद
धनक में सर थे तिरी शाल के चुराए हुए
अफ़ज़ाल नवेद
बाग़ क्या क्या शजर दिखाते हैं
अफ़ज़ाल नवेद
अपने ही तले आई ज़मीनों से निकल कर
अफ़ज़ाल नवेद
आँचल में नज़र आती हैं कुछ और सी आँखें
अफ़ज़ाल नवेद
उस पेड़ को छुआ तो समर-दार हो गया
अफ़ज़ल मिनहास
मुझे बतलाईए अब कौन सी जीने की सूरत है
अफ़ज़ल मिनहास
मिटते हुए नुक़ूश-ए-वफ़ा को उभारिए
अफ़ज़ल मिनहास
मैं फ़क़त इस जुर्म में दुनिया में रुस्वा हो गया
अफ़ज़ल मिनहास