Ghazal Poetry (page 886)
अचानक दिलरुबा मौसम का दिल-आज़ार हो जाना
अदा जाफ़री
आँखों में रूप सुब्ह की पहली किरन सा है
अदा जाफ़री
आलम ही और था जो शनासाइयों में था
अदा जाफ़री
आख़िरी टीस आज़माने को
अदा जाफ़री
आगे हरीम-ए-ग़म से कोई रास्ता न था
अदा जाफ़री
तज्दीद-ए-रिवायात-ए-कुहन करते रहेंगे
अबुल मुजाहिद ज़ाहिद
क़फ़स से छुटने पे शाद थे हम कि लज़्ज़त-ए-ज़िंदगी मिलेगी
अबुल मुजाहिद ज़ाहिद
नई सुब्ह चाहते हैं नई शाम चाहते हैं
अबुल मुजाहिद ज़ाहिद
हर एहतिमाम है दो दिन की ज़िंदगी के लिए
अबुल मुजाहिद ज़ाहिद
गिला किस से करें अग़्यार-ए-दिल-आज़ार कितने हैं
अबुल मुजाहिद ज़ाहिद
गया तो हुस्न न दीवार में न दर में था
अबुल मुजाहिद ज़ाहिद
क्यूँ असीर-ए-गेसू-ए-ख़म-दार-ए-क़ातिल हो गया
अबुल कलाम आज़ाद
इन शोख़ हसीनों की अदा और ही कुछ है
अबुल कलाम आज़ाद
ये इक और हम ने क़रीना किया
अबुल हसनात हक़्क़ी
ये इक और हम ने क़रीना किया
अबुल हसनात हक़्क़ी
तमाम हिज्र उसी का विसाल है उस का
अबुल हसनात हक़्क़ी
शिकस्त-ए-अहद पर इस के सिवा बहाना भी क्या
अबुल हसनात हक़्क़ी
शब को हर रंग में सैलाब तुम्हारा देखें
अबुल हसनात हक़्क़ी
फूल का या संग का इज़हार कर
अबुल हसनात हक़्क़ी
नुमू तो पहले भी था इज़्तिराब मैं ने दिया
अबुल हसनात हक़्क़ी
नक़्श-ए-यक़ीं तिरा वजूद-ए-वहम बुझा गुमाँ बुझा
अबुल हसनात हक़्क़ी
दिल को हम दरिया कहें मंज़र-निगारी और क्या
अबुल हसनात हक़्क़ी
बे-नियाज़-ए-दहर कर देता है इश्क़
अबुल हसनात हक़्क़ी
बे-नियाज़ दहर कर देता है इश्क़
अबुल हसनात हक़्क़ी
ज़ब्त कर आह बार बार न कर
अबू ज़ाहिद सय्यद यहया हुसैनी क़द्र
तेग़-ए-जफ़ा को तेरी नहीं इम्तिहाँ से रब्त
अबू ज़ाहिद सय्यद यहया हुसैनी क़द्र
मुश्किल है पता चलना क़िस्सों से मोहब्बत का
अबू ज़ाहिद सय्यद यहया हुसैनी क़द्र
कोह-ए-ग़म से क्या ग़रज़ फ़िक्र-ए-बुताँ से क्या ग़रज़
अबू ज़ाहिद सय्यद यहया हुसैनी क़द्र
ख़ामोश इस तरह से न जल कर धुआँ उठा
अबू ज़ाहिद सय्यद यहया हुसैनी क़द्र
है आम अज़ल ही से फ़ैज़ान मोहब्बत का
अबू ज़ाहिद सय्यद यहया हुसैनी क़द्र