Ghazal Poetry (page 884)
आँखों में आँसुओं को उभरने नहीं दिया
अदीम हाशमी
आग़ोश-ए-सितम में ही छुपा ले कोई आ कर
अदीम हाशमी
ये ज़मीनी भी है ज़मानी भी
अदील ज़ैदी
उस को जब कि मिरे अंजाम से कुछ काम नहीं
अदील ज़ैदी
तू जो चाहे भी तो सय्याद नहीं होने के
अदील ज़ैदी
सहरा-ओ-दश्त-ओ-सर्व-ओ-समन का शरीक था
अदील ज़ैदी
रह-ए-हयात में जो लोग जावेदाँ निकले
अदील ज़ैदी
क़र्ज़-ए-जाँ से निमट रही है हयात
अदील ज़ैदी
मोहब्बत की सज़ा पाई बहुत है
अदील ज़ैदी
ख़ाली दुनिया में गुज़र क्या करते
अदील ज़ैदी
जहान-ए-इल्म का बाब-ए-निसाब होते हुए
अदील ज़ैदी
हम ने थामा यक़ीं को गुमाँ छोड़ कर
अदील ज़ैदी
हम अपना आप लुटाने कहाँ पे आ गए हैं
अदील ज़ैदी
डराएगी भला क्या तेरी गर्दिश आसमाँ मुझ को
अदील ज़ैदी
बस लम्हे भर में फ़ैसला करना पड़ा मुझे
अदील ज़ैदी
वो पौ फटी वो किरन से किरन में आग लगी
अदीब सहारनपुरी
नहीं किसी की तवज्जोह ख़ुद-आगही की तरफ़
अदीब सहारनपुरी
नग़्मा-ए-इश्क़-ए-बुताँ और ज़रा आहिस्ता
अदीब सहारनपुरी
मिरे शौक़-ए-जुस्तुजू का किसे ए'तिबार होता
अदीब सहारनपुरी
मंज़िलें न भूलेंगे राह-रौ भटकने से
अदीब सहारनपुरी
इक ख़लिश को हासिल-ए-उम्र-ए-रवाँ रहने दिया
अदीब सहारनपुरी
इक ख़लिश को हासिल-ए-उम्र-ए-रवाँ रहने दिया
अदीब सहारनपुरी
बख़्शे फिर उस निगाह ने अरमाँ नए नए
अदीब सहारनपुरी
किस की ख़ल्वत से निखर कर सुब्ह-दम आती है धूप
अदीब ख़लवत
ज़बाँ को हुक्म निगाह-ए-करम को पहचाने
अदा जाफ़री
ये हुक्म है तिरी राहों में दूसरा न मिले
अदा जाफ़री
यही नहीं कि ज़ख़्म-ए-जाँ को चारा-जू मिला नहीं
अदा जाफ़री
वो लम्हा कि ख़ामोशी-ए-शब नग़्मा-सरा थी
अदा जाफ़री
वैसे ही ख़याल आ गया है
अदा जाफ़री
वही ना-सबूरी-ए-आरज़ू वही नक़्श-ए-पा वही जादा है
अदा जाफ़री