Ghazal Poetry (page 882)
जीता है सिर्फ़ तेरे लिए कौन मर के देख
आदिल मंसूरी
जलने लगे ख़ला में हवाओं के नक़्श-ए-पा
आदिल मंसूरी
इबलाग़ के बदन में तजस्सुस का सिलसिला
आदिल मंसूरी
हुआ ख़त्म दरिया तो सहरा लगा
आदिल मंसूरी
होने को यूँ तो शहर में अपना मकान था
आदिल मंसूरी
हाथ में आफ़्ताब पिघला कर
आदिल मंसूरी
हर ख़्वाब काली रात के साँचे में ढाल कर
आदिल मंसूरी
हज का सफ़र है इस में कोई साथ भी तो हो
आदिल मंसूरी
घूम रहा था एक शख़्स रात के ख़ारज़ार में
आदिल मंसूरी
गाँठी है उस ने दोस्ती इक पेश-इमाम से
आदिल मंसूरी
एक क़तरा अश्क का छलका तो दरिया कर दिया
आदिल मंसूरी
दूर उफ़ुक़ के पार से आवाज़ के पर्वरदिगार
आदिल मंसूरी
दरवाज़ा बंद देख के मेरे मकान का
आदिल मंसूरी
चेहरे पे चमचमाती हुई धूप मर गई
आदिल मंसूरी
चारों तरफ़ से मौत ने घेरा है ज़ीस्त को
आदिल मंसूरी
बिस्मिल के तड़पने की अदाओं में नशा था
आदिल मंसूरी
भूल कर भी न फिर मलेगा तू
आदिल मंसूरी
बदन पर नई फ़स्ल आने लगी
आदिल मंसूरी
अब टूटने ही वाला है तन्हाई का हिसार
आदिल मंसूरी
आशिक़ थे शहर में जो पुराने शराब के
आदिल मंसूरी
ये नहीं वो रहगुज़र कुछ और है
आदिल हयात
सुकून-ए-दिल फ़ना है और मैं हूँ
आदिल हयात
नहीं कोई ख़बर करना नहीं है
आदिल हयात
हर इक जवाब की तह में सवाल आएगा
आदिल हयात
दर्द-ए-दिल के तबीब होते हैं
आदिल हयात
बेबसी की धूप है ग़मगीन क्या
आदिल हयात
बात जो तुझ से ज़बानी हो गई
आदिल हयात
आने वाला है कोई मेहमान क्या
आदिल हयात
अर्सा-ए-माह-ओ-साल से गुज़रे
आदिल फ़रीदी
उसी एक फ़र्द के वास्ते मिरे दिल में दर्द है किस लिए
अदीम हाशमी