Ghazal Poetry (page 880)
सरिश्क-ए-ग़म की रवानी थमी है मुश्किल से
अफ़सर माहपुरी
मेरे लिए साहिल का नज़ारा भी बहुत है
अफ़सर माहपुरी
क्या बताएँ हाल-ए-दिल उन की शनासाई के ब'अद
अफ़सर माहपुरी
ग़म-ए-हयात के पेश-ओ-अक़ब नहीं पढ़ता
अफ़सर माहपुरी
बहार आएगी गुलशन में तो दार-ओ-गीर भी होगी
अफ़सर माहपुरी
अजीब चीज़ मोहब्बत की वारदात भी है
अफ़सर माहपुरी
सूरज कोई न कोई सितारा तुलू'अ हो
अफ़सर जमशेद
तेरी ख़ुशबू का तराशा है ये पैकर किस ने
अफ़सर आज़री
वही जो हया थी निगार आते आते
अफ़सर इलाहाबादी
तुम्हारे हिज्र में क्यूँ ज़िंदगी न मुश्किल हो
अफ़सर इलाहाबादी
न हो या रब ऐसी तबीअत किसी की
अफ़सर इलाहाबादी
कुछ भी नहीं जो याद-ए-बुतान-ए-हसीं नहीं
अफ़सर इलाहाबादी
फ़लक उन से जो बढ़ कर बद-चलन होता तो क्या होता
अफ़सर इलाहाबादी
तिश्नगी बाक़ी रहे दीवानगी बाक़ी रहे
अफ़रोज़ तालिब
यूँ ख़बर किसे थी मेरी तिरी मुख़बिरी से पहले
अफ़रोज़ आलम
तू मेरी नींदें तलाशता है यही बहुत है
अफ़रोज़ आलम
ठोकर से फ़क़ीरों की दुनिया का बिखर जाना
अफ़रोज़ आलम
शम्स मादूम है तारों में ज़िया है तो सही
अफ़रोज़ आलम
शबनम की तरह सुब्ह की आँखों में पड़ा है
अफ़रोज़ आलम
फैले हुए ग़ुबार का फिर मो'जिज़ा भी देख
अफ़रोज़ आलम
मौज-दर-मौज हवाओं से बचा लाऊँगा
अफ़रोज़ आलम
जिगर को ख़ून किए दिल को बे-क़रार अभी
अफ़रोज़ आलम
जगा जुनूँ को ज़रा नक़्शा-ए-मुक़द्दर खींच
अफ़रोज़ आलम
जगा जुनूँ को ज़रा नक़्शा-ए-मुक़द्दर खींच
अफ़रोज़ आलम
जब अपना साया ही दुश्मन है क्या किया जाए
अफ़रोज़ आलम
हिसार-ए-दीद में रोईदगी मालूम होती है
अफ़रोज़ आलम
गुज़रे लम्हात का एहसास हुआ जाता है
अफ़रोज़ आलम
दुश्मनों को मिरे हमराज़ करोगे शायद
अफ़रोज़ आलम
बड़ा ख़ुशनुमा ये मक़ाम है नई ज़िंदगी की तलाश कर
अफ़रोज़ आलम
अत्तार के मस्कन में ये कैसी उदासी है
अफ़रोज़ आलम