Ghazal Poetry (page 881)
ऐ दोस्त तिरी बात सहर-ख़ेज़ बहुत है
अफ़रोज़ आलम
आप से उन्स हुआ चाहता है
अफ़रोज़ आलम
उस ने क्यूँ सब से जुदा मेरी पज़ीराई की
अफ़ीफ़ सिराज
शौक़-ए-वारफ़्ता चला शहर-ए-तमाशा की तरफ़
अफ़ीफ़ सिराज
शब ढली मेरी और सहर न हुई
अफ़ीफ़ सिराज
मुझ को इक अर्सा-ए-दिल-गीर में रक्खा गया था
अफ़ीफ़ सिराज
मेरे जुनून-ए-शौक़ को इतनी सी काएनात बस
अफ़ीफ़ सिराज
हम अहल-ए-नज़ारा शाम-ओ-सहर आँखों को फ़िदया करते हैं
अफ़ीफ़ सिराज
हरीम-ए-दिल से निकल आँख के सराब में आ
अफ़ीफ़ सिराज
हमारी तिश्ना-लबी अब सुबू से खेलेगी
अफ़ीफ़ सिराज
बरसों के जैसे लम्हों में ये रात गुज़रती जाएगी
अफ़ीफ़ सिराज
अंदाज़-ए-नुमू कैसा अलमनाक निकाला
अफ़ीफ़ सिराज
आप ने आज ये महफ़िल जो सजाई हुई है
अफ़ीफ़ सिराज
जो बन-सँवर के वो इक माह-रू निकलता है
अादिल रशीद
ज़मीं छोड़ कर मैं किधर जाऊँगा
आदिल मंसूरी
ये फैलती शिकस्तगी एहसास की तरफ़
आदिल मंसूरी
वुसअत-ए-दामन-ए-सहरा देखूँ
आदिल मंसूरी
वो तुम तक कैसे आता
आदिल मंसूरी
वो बरसात की शब वो पिछ्ला पहर
आदिल मंसूरी
सोए हुए पलंग के साए जगा गया
आदिल मंसूरी
साँस की आँच ज़रा तेज़ करो
आदिल मंसूरी
सड़कों पर सूरज उतरा
आदिल मंसूरी
फिर किसी ख़्वाब के पर्दे से पुकारा जाऊँ
आदिल मंसूरी
फैले हुए हैं शहर में साए निढाल से
आदिल मंसूरी
पानी को पत्थर कहते हैं
आदिल मंसूरी
पहलू के आर-पार गुज़रता हुआ सा हो
आदिल मंसूरी
न कोई रोक सका ख़्वाब के सफ़ीरों को
आदिल मंसूरी
मुझे पसंद नहीं ऐसे कारोबार में हूँ
आदिल मंसूरी
कौन था वो ख़्वाब के मल्बूस में लिपटा हुआ
आदिल मंसूरी
जो चीज़ थी कमरे में वो बे-रब्त पड़ी थी
आदिल मंसूरी