Ghazal Poetry (page 879)

हर फूल है हवाओं के रुख़ पर खिला हुआ

आफ़ताब हुसैन

गुज़रते वक़्त की कोई निशानी साथ रखता हूँ

आफ़ताब हुसैन

घड़ी घड़ी उसे रोको घड़ी घड़ी समझाओ

आफ़ताब हुसैन

गए मंज़रों से ये क्या उड़ा है निगाह में

आफ़ताब हुसैन

फ़सील-ए-शहर-ए-तमन्ना में दर बनाते हुए

आफ़ताब हुसैन

दिल भी आप को भूल चुका है

आफ़ताब हुसैन

धूप जब ढल गई तो साया नहीं

आफ़ताब हुसैन

देखे कोई तअल्लुक़-ए-ख़ातिर के रंग भी

आफ़ताब हुसैन

दे रहे हैं जिस को तोपों की सलामी आदमी

आफ़ताब हुसैन

बस एक बात की उस को ख़बर ज़रूरी है

आफ़ताब हुसैन

अस्ल हालत का बयाँ ज़ाहिर के साँचों में नहीं

आफ़ताब हुसैन

अपना दीवाना बना कर ले जाए

आफ़ताब हुसैन

अना को बाँधता रहता हूँ अपने शे'रों में

आफ़ताब हुसैन

प्यासी हैं रगें जिस्म को ख़ूँ मिल नहीं सकता

आफ़ताब आरिफ़

पछता रहे हैं दर्द के रिश्तों को तोड़ कर

आफ़ताब आरिफ़

कहूँ जो कर्ब फ़क़त कर्ब-ए-ज़ात समझोगे

आफ़ताब आरिफ़

मुझ को मंज़र के सिले में वो सदा भेजता है

आफ़ताब अहमद शाह

ये रेग-ए-रवाँ याद-दहानी तो नहीं क्या

आफ़ताब अहमद

उम्र-ए-रफ़्ता मैं तिरे हाथ भी क्या आया हूँ

आफ़ताब अहमद

मुमकिन है शय वही हो मगर हू-ब-हू न हो

आफ़ताब अहमद

किसी निशाँ से अलामत से या सनद से न हो

आफ़ताब अहमद

खुली आँखों में दर आने से पहले

आफ़ताब अहमद

यास है हसरत है ग़म है और शब-ए-दीजूर है

अफ़सर मेरठी

परेशानी है जी घबरा रहा है

अफ़सर मेरठी

जिन को हर हालत में ख़ुश और शादमाँ पाता हूँ मैं

अफ़सर मेरठी

असर देखा दुआ जब रात भर की

अफ़सर मेरठी

आग़ाज़ हुआ है उल्फ़त का अब देखिए क्या क्या होना है

अफ़सर मेरठी

वो हमारी सम्त अपना रुख़ बदलता क्यूँ नहीं

अफ़सर माहपुरी

उन से हर हाल में तुम सिलसिला-जुम्बाँ रखना

अफ़सर माहपुरी

शब को पाज़ेब की झंकार सी आ जाती है

अफ़सर माहपुरी